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मर्द का मज़हब, औरत की जात…!

मर्द का मज़हब, औरत की जात...!Hindi Story by Gaurav Sinha
मर्द, मज़हब और मैं…समाज की तीन सबसे बड़ी दीवारों पर एक प्रहार!

कॉलेज में इलेक्शन होने थे, और नामांकन का आख़िरी दिन।
एक लड़की सफ़ेद सूट और काला दुपट्टा पहने कॉरिडॉर से गुज़र रही थी।
और उससे कुछ दूर दो लड़के उसे देखकर आहें भर रहे थे।

“तू मेरे सामने, मैं तेरे सामने, तुझको देखूँ कि प्यार करूँ” —
जैसे ही रोहित को ये गुनगुनाते हुए सुना, शाहिद के मुँह से निकला –
“वाह मेरे बाज़ीगर, ये सुनकर किरण दौड़ती हुई आएगी और तुझे ज़ोर से गले लगाकर…
धीरे से तेरे कानों में बोलेगी…
हीरो के बच्चे, तुझको लोगों से पिटवाऊँ या पुलिस के हवाले करूँ।”

“क्या यार, सारा मज़ा ख़राब कर दिया।
बस मुस्कुराने ही वाली थी आज वो।
और ये तेरी बकवास लाइन नहीं।
डुएट को पूरा करती मेरी बाँहों में समाकर…

टूट गई, टूट के मैं चूर हो गई…
तेरी ज़िद पे मज़बूर हो गई…
तेरे जैसे दोस्त हों तो दुश्मनों की क्या ज़रूरत।” — मुँह सड़ाते हुए रोहित बोला।

दोनों बचपन के दोस्त थे।
पढ़ाई में अव्वल और दोस्ती निभाने में भी।
जहाँ पूरे देश में लोग धर्म के नाम पर आग-बबूला रहते थे,
इन दोनों को कोई परवाह नहीं थी।

तब से एक-दूसरे को जानते थे, जब ठीक से बोलना भी नहीं आता था।
एक ही स्कूल गए, एक ही मोहल्ले में रहे
और आज साथ में ग्रेजुएशन, इंटर कॉलेज डिबेट और यूथ पॉलिटिक्स में भी भागीदारी कर रहे थे।

क्योंकि इतनी बातें मिलती थीं, तो ज़ाहिर है कॉलेज के फ़र्स्ट इयर में दोनों को एक ही मोहतरमा पसंद आ गई।
नाम था किरण।
थी भी सूरज की किरण जैसी धारदार, मुँहफट और बला की ख़ूबसूरत।
दो साल में दोनों दोस्त एक बार भी किरण को कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे।

रोहित की इस अटपटी और एक हद तक बेहूदा कोशिश के बाद शाहिद से रहा नहीं गया।

“यार रोहित, ये भी कोई बात हुई!
टिपिकल फ़िल्मी हीरो वाली हरकत।
ज़माना बदल गया है।
लड़कियों की इज़्ज़त करो।
इलेक्शन कैंपेन में तो कहते फिरते हो कि हम लड़कियों को भी बराबरी का मौका देंगे,
कॉलेज पॉलिटिक्स हो या कोई इवेंट, उनको समान मौका देंगे —
और यहाँ एक लड़की को सामान की तरह ट्रीट कर रहे हो।”

“शाहिद मियाँ, तुम रहने दो।
एक बार बात तक तो कर नहीं पाए उससे।

बस लाइब्रेरी में किताब का नाम क्या पूछ लिया,
तुमको लगता है वो तुम पर लट्टू है।

अरे वो जानती है रोहित अल्फ़ा मेल है,
और ये किताबी शाहिद एक नंबर का फट्टू है।

शाहिद हो, शहीद होने की कोशिश मत करो।
तुम ऊपर वाले से डरो, काफ़िर लड़की के जाल में न फँसो।

कल देखा नहीं, न्यूज़ वाला कैसे चिल्ला रहा था —
‘लव जिहाद, देश से मिटाना होगा,
देश को हर हाल में बचाना होगा।’”

शाहिद जानता था मज़ाक किया है रोहित ने।
पर बात न चाहते हुए भी उसके सख़्त दिल के किसी मुलायम कोने में धीरे से चुभ गई।
और आमतौर पर ख़ुद पर क़ाबू रखने वाला शाहिद भी बोल पड़ा —

“तुझे लगता है वो तेरी हो जाएगी?
तू जानता ही नहीं, वो कभी तुझे मिल ही नहीं पाएगी।

तुझे लगता है लव जिहाद बस धर्म का मामला है?
ओ नासमझ! समझ कि तेरा अपने से नीची जात वाली लड़की से इश्क़…
लव जिहाद से भी कहीं संगीन गुनाह है।”

सुनकर रोहित को झटका लगा।
“क्या मतलब? किरण, छोटी जात?
क्या बकवास कर रहा है।

देखा है उसको ग़ौर से?
किसी एंगल से लगती है रिज़र्व्ड कैटेगरी?

बेटा, अगर उसने सुन लिया तो लगवाकर आर्टिकल पंद्रह तुझे पहुँचा देगी कोर्ट-कचहरी।”

“नहीं भाई, ये सच है कि वो तेरे धर्म की होकर भी तुझसे अलग है।
हाँ, ये भी सच है कि मेरे घरवाले भी नहीं मानेंगे क्योंकि हमारे इश्क़ के बीच मज़हब है।”

तभी पीछे से ज़ोर-ज़ोर से तालियों की आवाज़ आई।
किरण सब सुन चुकी थी और ताली बजाते हुए सामने आकर बोली –

“वाह-वाह-वाह!
क्या कमाल की जोड़ी है इस राम और रहीम की।

पहले मुझे लगता था जैसे भी हैं, नफ़रती नहीं तो लड़के अच्छे हैं।
पर आज पता लगा कि ये नकली शेर अंदर से गीदड़ जैसे हैं।

ये दिलाएँगे हमको बराबरी?
पहले अपने दिमाग़ की तो मिटा लें ये ख़राबी।

तो शाहिद, तुम्हें लगता है घरवाले नहीं मानेंगे,
तो इज़हार भी न कर पाओगे?

जाओ, तुम्हारे बस की नहीं।
तुम क्या ख़ाक इश्क़ निभाओगे?

और तुम रोहित, तुम्हारे क्या कहने!
लड़की को सामान समझकर क्या ही सम्मान दे पाओगे।

वो सब छोड़ो।
तुम अपने बंद ढक्कन दिमाग़ की गाड़ी रिज़र्व से आगे कैसे बढ़ाओगे?

जात अलग हुई तो क्या अपनी प्रेमिका को गले भी नहीं लगा पाओगे?
गले लगाना तो दूर, तुम्हारा मुँह नहीं खुलेगा अपने घरवालों के आगे।

थू है तुम जैसे इंसान पर,
चाहे लगा लो अल्फ़ा-बीटा-गामा अपनी खोखली मेल कैटेगरी के आगे।”

दोनों का मुँह शर्म से लाल हो गया था।
नज़रें ज़मीन से ऊपर नहीं उठ पा रही थीं।
किसी ने उनको ऐसे जलील होते नहीं देखा था,
पर उनको लग रहा था सारा कॉलेज वहीं खड़ा उन पर हँस रहा था।

किरण ने जाकर कॉलेज की सेक्रेटरी पद के लिए पर्चा भरकर नामांकन किया।
उसे पता था रोहित को चुनाव में हराना मुश्किल था,
पर वो ये भी जानती थी कि उस लड़के का उससे कोई मुक़ाबला ही नहीं था।

वो पहले ही जीत चुकी थी।
उसे ज़िंदगी में बहुत कुछ करना था।

एक बात और जान पाई थी —
जात-पात, धर्म से आगे इंसान की सदियों से जो रिज़र्व्ड कैटेगरी है,
वो है औरत होना।

और जब मौका औरत को नीचा दिखाने का आता है,
तो मर्द अपना धर्म, जात-पात सब भुलाकर सिर्फ़ मर्द रह जाता है।

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