
“ऐसे कैसे”
“मेरा मन”
मन का क्या है…
“मुझे बहस करनी ही नहीं, बस…”
“ये अच्छा है, पहले शुरू करो और फिर… कोई बात बुरी लगी हो, तो उसका इलाज बात न करना थोड़ी है… सबकी अपनी-अपनी समझ है, कोई तुम्हारे मन की बात कैसे पढ़ लेगा भाई…”
“जो करना है करो, मेरा दिमाग मत खराब करो, निकलो यहाँ से…”
“अपने ही घर से, कहाँ… क्यों? हद है…”
समीर ने इसके बाद चुप हो जाना ही बेहतर समझा।जब दूध उबाल पर हो, तब गैस की नॉब को लो रखने में ही गनीमत, वरना किस पल उबलकर पतीले से बाहर आ जाए कौन जाने। फिर करते रहो सफाई।
उधर मीरा नाक लाल किए, बच्चों की एग्ज़ाम शीट्स का बंडल लेकर बैठ गई।
“जाने अब कितनों की शीट पर लाल पेन का वार होगा” — ऐसा समीर ने मन ही मन मुस्कुराते हुए सोचा।
इसमें सच्चाई नहीं थी। मीरा की खासियत यही थी कि वो जो काम करती थी, पूरी ईमानदारी और तसल्ली से करती थी। फिर चाहे वो आंसर शीट्स चेक करना हो, या गुस्सा दिखाना। दो कामों और भावनाओं को आपस में उलझने नहीं देती थी।
समीर की आदत थी कि जो गलतफहमी हो, जो मनमुटाव हो, उसे बात करके सुलझा लिया जाए। मीरा का पारा ऐसे समय में हाई होता था। उसके लिए ज़रूरी था थोड़ी देर के लिए खुद को सिचुएशन से दूर करना, ताकि उसका गुस्सा उसका और सामने वाले इंसान का पूरा दिन बर्बाद न कर दे।
बहुत समय तक किसी को जानने के बहुत से फ़ायदों में एक सबसे बड़ा फ़ायदा ये होता है कि कम से कम आपको पता होता है कि क्या करने से बात बिगड़ेगी और क्या करने से मामला संभाला जा सकता है। और कभी-कभी कुछ न करना ही सबसे सही तरीका होता है, ताकि तेज़ हवा में उड़ी हुई रेत खुद-ब-खुद शांत होकर ज़मीन पर पसर जाए। वरना वही रेत बवंडर बन सब कुछ उड़ा कर ले जाने का दम भी रखती है।
“चाय किचन में…”
“हाँ, आ रहा हूँ।”
दूसरे कमरे से समीर ने कुछ काम करते हुए जवाब दिया…
ठीक तीन सेकंड बाद फिर से —
“चाय किचन में है, आकर पी लो…”
(इस बार वॉल्यूम दोगुना था)
“हाँ-हाँ, सुन लिया, बोला तो आ रहा हूँ, सब्र करो….”
अपना काम छोड़ समीर बुदबुदाते हुए लिविंग रूम में पहुँचा।
“यार, मैंने कब बोला कि चाय पीनी है। और बोला तो आ रहा हूँ। तुम तो गोलियाँ चलाने लगती हो।”
“एक तो बनी-बनाई चाय मिल रही है, ऊपर से नखरे। पीनी हो तो पियो, नहीं तो फेंक दो।”
हमेशा की तरह मुँह टेढ़ा करते हुए मीरा बोली।
सुबह की तेज़ हवा आँधी का रूप नहीं ले पाई थी। शाम होते-होते मौसम सुहाना था।
“अरे बैठकर टीवी क्या देखने लगे, जाओ समीरा के ट्यूशन का टाइम खत्म हो गया है, जाकर ले आओ उसे।”
“ले आओ? फ़िफ्थ फ़्लोर पर है वो, और हम सिक्स्थ पर। और समीरा सेवन्थ क्लास में है। अगर मैं उसे लेने पहुँच गया तो वो भी तुम्हारी तरह… नहीं, तुमसे भी तेज़ चिल्लाएगी — पापा आई ऐम नॉट अ किड नाउ।”
“संडे है तो कुछ मत करना तुम, बस बहाने। टीवी बंद करो… चलो, दोनों ही चलते हैं, नीचे पार्क में घूम लेंगे उसके साथ…”
“हाँ, ये आइडिया अच्छा है। इसी बहाने बच्चों के बैडमिंटन टूर्नामेंट में मैं भी शो-ऑफ कर दूँगा। भाई, मैं भी स्कूल चैम्पियन था। था कि नहीं?”
“बकवास करने में चैम्पियन हो तुम। पता नहीं क्या सोचकर मैंने पसंद कर लिया तुम्हें। स्कूल में तो मुँह खुलता नहीं था। अब है कि चुप होकर नहीं राज़ी।”
“पता नहीं क्या सोचकर पसंद कर लिया तुमने। हाँ, ये बात तो मेरी समझ में भी नहीं आई कभी। तुम क्लास टॉपर, तुम्हारा वो हाई-फ़ाई ग्रुप होता था, और हम बैक-बेंचर। स्कूल के सभी लड़के जिस लड़की पर लट्टू थे, वो मुझ पर फ़िदा हो गई। अभी भी मिलते हैं तो चिढ़ते हैं साले।”
“साले… तुम आज भी वही बैक-बेंचर हो, कोई तमीज़ नहीं। चुप करो, वरना तुम्हारी टीचर बेटी लेगी तुम्हारी क्लास — पापा लैंग्वेज प्लीज़….”
दोनों घर से बाहर निकलते हुए ज़ोर-ज़ोर से हँस पड़े।
“पापा, एक क्वेश्चन पूछूँ?”
“दो पूछो बेटा, सवाल करना तो अच्छी बात है…”
“मेरे स्कूल में एक न्यू एडमिशन हुआ है, उसका नाम रोशनी है। क्लास टीचर ने मुझे उसका बड्डी मेंटोर बनाया है…”
“तुम्हें बुड्ढी मेंटोर? ये तो गलत बात है, तुम तो अभी बच्ची हो। कल ही कम्प्लेंट करता हूँ तुम्हारी टीचर की प्रिंसिपल से।”
“बस करो पापा, इट्स नॉट फ़नी।”
“हाँ-हाँ, सीरियस बड्डी मेंटोर, बोलो क्या हुआ….”
“तो आई हैव बीन ट्राइंग टू टॉक टू रोशनी, पर वो बस हूँ, हाँ करती है, ज़्यादा कुछ बोलती नहीं। मेरे सारे फ़्रेंड्स कहते हैं कि उसमें बहुत एटिट्यूड है। अब बताओ, अगर वो बात नहीं करेगी तो… हाउ कैन आई हेल्प हर? टीचर तो यही समझेगी कि मैं अच्छी मेंटोर नहीं।”
“अच्छा, ये तो बड़ी प्रॉब्लम है। क्या तुमको भी लगता है उसमें ज़्यादा एटिट्यूड है?”
“पता नहीं। आपने ही तो बोला था जज नहीं करना चाहिए। इसलिए जब तक वो मुझसे खुद कुछ नहीं कहेगी, तब तक नो जजमेंट।”
समीर ने मुस्कुराते हुए समीरा के सिर पर हाथ फेरा —
“शाबाश बेटा, तुम तो बेस्ट मेंटोर हो। उसको थोड़ा और टाइम दो। नया स्कूल, नए लोग, एडजस्ट होने में टाइम लगता है।”
“अरे, क्या सोच रहे हो? कब से हम बुला रहे हैं। बैडमिंटन खेलने चलो, बड़ी-बड़ी बातें की थीं। अब टाइम आ गया टैलंट प्रूव करने का।”
“हम्म… कुछ नहीं। फ़्लैशबैक मोड ऑन हो गया था। हमेशा मम्मी-पापा को बहस करते देखा। एक दिन तो खाने के टेस्ट को लेकर हंगामा हुआ था। मुझे लगता था शादी के बाद ऐसी लड़ाइयाँ होना नॉर्मल है। बाद में हफ़्तों तक दोनों में बातचीत बंद रहती थी। हम बच्चे उन दोनों के ईगो में पिसते रहते थे…”
“अच्छा, तो मज़ा नहीं आ रहा तुम्हें? मैं मान जाती हूँ जल्दी इसलिए। फाइट चाहिए? हफ़्ते-दो हफ़्तों वाली?”
“अरे बिल्कुल नहीं। और हम करेंगे भी तो हमारी टीचर है न, वो मामला संभाल लेगी। उससे कौन पंगा ले…”
“हाँ, ये तो है। और सच कहूँ तो उसमें ये समझ भी तुमसे ही आई है। वरना गोलियाँ तो मैं सच में चलाती हूँ।”
तभी समीरा दौड़ते हुए आई और बोली —
“पापा, नीचे जाने से पहले मेरी बात सुनो…”
“लो आ गई हमारी मेंटोर, टीचर, प्रिंसिपल।”
“पापा, वो रोशनी अब मेरी बेस्ट फ्रेंड हो गई है। वो मैथ्स में टॉपर थी अपने पुराने स्कूल में। वो मेरी हेल्प कर रही है मैथ्स में और मैं उसकी हिन्दी में।”
“अरे वाह। पर हिन्दी में तुम उसकी क्या हेल्प करोगी, तुम्हारी हिन्दी तो खुद इंग्लिश के भरोसे है।”
“पापा, यू आर नॉट फ़नी।”
“यस, समीर, दिस इज़ नॉट फ़नी।”
समीरा और मीरा ने एक साथ कहा, मुँह चिढ़ाते हुए।
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A good piece ! Reflects our time when no one has the patience to keep quiet and listen
A matured way of handling the narrative and not making it boring
That’s very sweet and warm story. It reflects the contemporary marriages . I like how you have shown a regular day and their conflicts that barely matter at the end of the day. There’s no villain or hero, just a regular couple where if one argues, the other understands and gives space… The child father conversation was also a good parallel story. I enjoyed the read! Thanks