
एक दिन मेरा मन बहुत खुश था। खुश क्या उछल कूद कर रहा था। इतना ज़्यादा जोश में था कि दिमाग डर गया कि कहीं दिल को झटका लग जाये। मतलब स्ट्रोक वगेरह न आ जाए। यूँ भी बीते कुछ सालों में नया ट्रेंड चला है। दिल की धड़कने बढ़ाने के चक्कर में, जवान लोगों के दिल अचानक धड़कने बंद हो गए। कोई खेल के ग्राउंड में बाउंडरी पार कर खुद ही इस दुनिया की बाउंडरी पार कर गया। तो कोई शादी की बारात में नाचते नाचते गलत वेन्यू (पंडाल) में चला गया। जहाँ शादी के मेनू की जगह की जगह उसे अपनी छोटी सी ज़िंदगी में किए गए हर अच्छे बुरे काम की लंबी सी लिस्ट पकड़ा दी गई। और पूछा गया अब आगे कहाँ भेजें स्वर्ग या नर्क। तो बेचारा बोल पड़ा – “समय ही कहाँ मिला। ये तो सरासर नाइंसाफी है। वेटिंग लिस्ट में भी नहीं था मैं, आपने तत्काल टिकट से यहाँ बुला लिया।“ ऐसे ही न जाने कितने किस्से हुए, जिनमें कुछ हमें पता चले। कुछ हमारे लिए गुमनाम रह गए।
दिमाग की इस चिंता का जब मन को पता चला तो वो हँस पड़ा – “बोला लूक विद इन (अपने अंदर झाँको) सब कुछ अंदर ही है बाहर कुछ नहीं धरा। जब तक मैं ठीक हूँ, खुश हूँ। दिल या किसी और हिस्से को घबराने की जरूरत नहीं।“
दिमाग धीरे से बुदबुदाया – “लोगों ने आजकल कुछ ज़्यादा ही सर पर बैठा लिया है इसे। जब देखो बिना लॉजिक की बातें करता है। अपने अंदर झाँको…बकवास… जिस दिन दिल के दौरे, पाँव में मोच, पेट में मरोड़, दाँत के उखड़ने और घुटने के चटकने का दर्द होगा तब ऊई आह.. करता फिरेगा। बड़ा आया ज्ञानी कहीं का। कहीं का? यहीं का तो है… इसका कुछ कर भी नहीं सकते। पर ये बेवकूफ़ इतना नहीं जानता कि इसकी ये बकबक तब तक ही है, जब तक हम सब सही सलामत हैं। हमारे बिना इसका कोई वजूद ही नहीं। इसको याद दिलाना पड़ेगा कि जान है तो जहान है। वैसे करे भी क्या बेचारा मन है, तो मन की ही बात करेगा। सुनाई तो देता नहीं इसको। और साहब के नखरे देखो, कभी कभी बिना किसी बात के मुँह लटकाए घूमता है। कम से कम हम लोग जो शरीर के बाकी काम काज़ी हिस्से हैं। इसकी तरह नाटक तो नहीं करते। हमारा ख्याल न भी रखा जाये तब भी अंतिम साँस तक साथ निभाते हैं इंसान का। टक्कर की फाइट देते हैं। फाइटिंग स्पिरिट है हमारी। अब जब इंसान सारा टाइम इस मन को मनाने और इसी की सुनने में लगा रहे। हमें पूरी तरह अनाथ बच्चे सा अपने हाल पर छोड दे… तो हम करें भी तो क्या… जाएँ भी तो कहाँ…कहें भी तो किससे? हमारी भाषा तो इंसान की समझ में आती नहीं।“
मन दिमाग की दुविधा समझकर थोड़ा संजीदा हुआ और उसको दिलासा देते हुए बोला – “दुखी मत हो भाई। समझ रहा हूँ तेरा दुख। जैसे जैसे इंसान ने तरक्की की है, वो बड़ी बातें तो समझने लगा है। पर छोटी, आसान और ज़रूरी बातें भूलता जा रहा है। सच ही कहा तुमने आजकल में फ़ैशन में हूँ। दुनिया सेल्फ लव, और मोटिवेशन के सागर में गोते लगा रही है। जो गलत नहीं और न ही नया है, ‘मन चंगा तो कठोती में गंगा’ कब से चला आ रहा। पर आज जब ये तेरा फिल्मी मोनोलाग सुना तो बात कुछ कुछ समझ आई। ले देकर सारा खेल तो बैलेन्स का ही है। अगर शरीर ही नहीं रहेगा, तो मन क्या भजेगा। जैसे मेरे ठीक होने से तुम लोग ठीक, वैसे ही तुम लोग जब फिट रहते हो। तब ये इंसान अच्छी बातें सोचता है। नहीं तो पता नहीं क्या क्या बकवास रिपीट मोड में चलता है, और मुझे ओवरटाइम करना पड़ता है। तुम लोग तो फिर भी साथ काम करते हो। मैं तो हूँ भी अकेला कर्मचारी इस स्वतंत्र विभाग का। मत पूछो क्या हाल होता है। कई कई साल, और कई बार तो उम्र लग जाती है मुझे छुट्टी मिलने में। तू चिंता मत कर मैं मालिक को इंग्लिश में भी समझा दूंगा कि “हैल्थ इस वैल्थ” और मुझपे सारा प्यार न लुटाये तुम लोगों को भी थोड़ा चलाये, दौड़ाए ताकि मैं आराम से रह सकूँ।
“समझ गए भाई साहब या दिमाग से कहकर शरीर से कोई सिग्नल दिलवाऊँ?” – मन अंदर से बाहर झाँकते हुए मुझसे बोला।
हाँ भाई, समझा, कुछ दिन से एक्सर्साइज़ पर ध्यान कम था, दोबारा शुरू करते हैं और खाने पीने पर भी लगाम लगाते हैं। तुम दोनों यूँ ही डिबेट करते रहा करो। हैल्थ की डेमोक्रेसी और स्वस्थ ज़िंदगी के लिए ज़रूरी है कि मन के अंदर झाँकने के साथ साथ बाहर क्या चल रहा है उसका भी ख्याल रखा जाये।
“बैलेन्स, संतुलन, और हैप्पी हम” दिमाग, मन और मैं… तीनों एक साथ बोल पड़े।
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