अजनबी हमसफ़र!

अजनबी हमसफ़र: कहानी जून की गर्मी में दिसम्बर की ठंडक की! A Short love Story by Gaurav Sinha Photo by Marcelo Renda.. picture of a girl walking in an airport corridor with luggage.
Photo by Marcelo Renda

सेक्युर्टी चेक करवाकर दौड़ता हुआ बोर्डिंग गेट पर पहुँचा। लंबाई ठीक ठाक मतलब अपने देश के एव्रेज से थोड़ी ऊपर। कार्गो पैंट ग्रे कलर की, और व्हाइट टी शर्ट। बाल न लंबे न फौजी कट, मतलब शरीफों में भी गिनती हो जाए और बेफिक्र लड़कों में भी। उम्र उतनी जिसमें दोस्त दोस्त न रहे, और जहाँ प्यार हो सकता था, वो भी हुआ, और न भी हुआ। मतलब दोस्तों ने आँख बंद करके शादी के उस पार वाली ज़िंदगी में छलांग लगा ली थी और चाहते थे, ये भाई साहब क्यूँ बचे रहें। नाम था राजेंद्र, दोस्त प्यार से क्या कहते होंगे वो आप गैस कर ही लेंगे। हाँ, वही शाहरुख खान का फिल्मी नाम।

बोर्डिंग गेट पर एयर होस्टेस्स ने हँसते हुए टिकट चेक किया। वो भी मुस्कुराया और थैंक यू कहकर आगे बढ़ गया। आगे थी एक लंबी लाइन जिसमें सब चल नहीं रहे थे। बल्कि, अपने जूते चप्पल एयरपोर्ट के साफ सुथरे चमकते फ्लोर पर घसीट भर पा रहे थे। क्यूंकी कदम उठाने का मौका नहीं मिल रहा था। अपने राज भाई साहब को समझ आया कि भाग दौड़ फिज़ूल थी। आराम से आता तो भी हवाई जहाज़ कहीं उड़ा नहीं जा रहा था। ज़मीन पर ही अंगड़ाई लेता मिल जाता। ख़ैर एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और बस स्टॉप पर नहीं भागे तो क्या ही मज़ा लिया इस महान देश में जन्म लेने का।

ऐसे धीरे धीरे चलने, या खुद को धकेलने में भी अलग आनंद है। कितना वक़्त मिल जाता है, आस पास के लोगों और उनके हाव भाव को पढ़ने का। इस लिखा पढ़ी की वजह भी उसके आगे थी। एक लड़की, जिसने जाने कौन सा पर्फ्यूम लगाया था। आस पास की एयर कंडीशनर की ठंडी हवा कुछ और ज़्यादा ठंडी हो गई थी और साथ ही महक उठी थी। और दूसरी तरफ अपने राज साहब, पसीने पसीने, लेट लतीफी की आदत में उसका हर बार यही हाल होता था। लड़की दुबली पतली, फ्लोरल ड्रेस पहने थी, आँखों को ढकता चश्मा, और चश्में से झाँकती दो छोटी-छोटी आँखें। एक दो बार दोनों की नज़रें टकराई भी, और राज ने मुस्कुराकर खुद को समझदार दिखाने की कोशिश की, मगर लड़की ने देख कर भी अनदेखा किया जो कि बिलकुल जायज़ था।

किसी तरह सब रेंगते रेंगते प्लेन में चढ़े, सामान और बैग इधर उधर उछाले गए, सीट एक्स्चेंज करने की मिन्नतें हुईं, कैबिन क्रू ने खुद को किसी तरह चिल्लाने से रोका। थोड़ी देर के इस साँप सीढ़ी के खेल के बाद मानों रंग बिरंगी गोटियाँ अपने अपने पाले में जाकर सेट हो गईं। अपने राज साहब की खुशी का ठिकाना नहीं था। जिसके पीछे पीछे मन ही मन फिल्मी गाने गाता आया था, उसी के साथ सीट भी मिल गई। पर खुशी चेहरे से ज़ाहिर न हो, इसका पूरा एहतियात बरता गया। लड़की विंडो सीट पर थी, राज मिडिल सीट पर और आइल यानि किनारे वाली सीट पर एक अंकल जी। अंकल आते ही मैगज़ीन पढ़ने में बिज़ि हो गए और राज फ्लोरल ड्रेस में साथ बैठी छोटे से सफर की हमसफर की खुशबू में खोया हुआ। और इन सबसे अंजान लड़की खिड़की से झाँकते बादलों में खोई हुई। खुशनुमा माहौल – लकी अली का गाना “सफरनामा” बैक्ग्राउण्ड म्यूजिक के लिए पर्फेक्ट चॉइस।

“सोर्री सोर्री सोर्री, आई एएम रिएलि सोर्री” लड़की के मुंह से राज के लिए ये सबसे पहले शब्द निकले थे। वजह गरमा गरम चाय उस बेचारे पर बिखर गई थी। ख़ैर ये दुर्घटना सुखद घटना थी। बीच की सीट में बैठने का बेनिफ़िट हुआ था। दोनों में बात शुरू हुई। लड़की ने अपना नाम सिमरन बताया, राज अपनी हँसी रोक नहीं पाया। फिर बोला “मेरा नाम राजेंद्र है जिसे सुनकर सिमरन भी हँसी रोक नहीं पाई। “आज के ज़माने में पुराने ज़माने वाला नाम – राजेंद्र बाबू” बोलकर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी। उधर अंकल से भी रहा न गया और धीरे से गर्दन घुमाते हुए, दबी हुई हँसी और आँखों में चमक लिए बोले “माईसेल्फ़ रोनित”। ये सुनकर राज जो थोड़ा झेंप गया था वो भी ठहाके लगाने लगा।

सफ़र आगे बढ़ा, शुरुवाती असहजता अब खत्म हो गई थी। राज, सिमरन और रोनित में बातें होने लगी। रोनित अंकल अपने नाम के हिसाब से ही मॉडर्न ख़्याल के थे। उन्हे मज़ा आ रहा था – इस नयी पीढ़ी के तजुर्बे और दिक्कतें सुनकर। बीच बीच में अपने एक्सपर्ट कमेंट करते जा रहे थे। राज और सिमरन को भी रोनित में अंकल से ज़्यादा एक दोस्त ही नज़र आ रहा था। जो उन्हें जज नहीं कर रहा था। रोनित अंकल को थोड़ी देर में समझ आया कि वो एक पॉसिबल लव स्टोरी के शुरू होने में अड़चन साबित हो रहें हैं। तो उन्होनें फटाफट सोने का नाटक किया और अपना रुमाल मुँह पर रख कर, कुंभकर्ण मोड ऑन किया। ये बात राज को अच्छी लगी। उसे लगा कि उसका टाइम आ गया है। दिमाग में तरह तरह के फोर्मूले और आइडिया आने लगे – “ऐसे बात करे, वैसे बात करे, जैसे भी बात करे, बस सिमरन के ऊपर अच्छा इम्प्रैशन पड़े।“  मिशन ये था कि फ्लाइट के लैंड होने के बाद भी, उन दोनों का सफ़र खतम न हो।

उधर विंडो सीट पर बैठी सिमरन अब पहले से ज़्यादा सहज़ थी। खासकर जब तक रोनित और राज दोनों से बात हो रही थी। लेकिन रोनित के चुप होते ही उसका डिफेंस सिस्टम ऑन हुआ। राज ठीक ठाक है, बातों से पता लग रहा, पर है तो अजनबी ही। ज़्यादा फ्रैंक होना क्या सही रहेगा – “ये लड़के होते भी तो अजीब है। थोड़ा हँसकर बात कर लो तो इनके दिमाग में पूरी रोमांटिक मूवी बन जाती है। जैसे लड़की हँस नहीं रही, उसने शादी के लिए हाँ कर दी हो” राज अपने दिमाग में से आइडिया निकालकर, उनको नाप तोल कर बहाने से सिमरन से कुछ न कुछ पूछता और सिमरन, बस हाँ या ना.. हूँ हाँ..  में जवाब देती। हल्का फुल्का हँसी मज़ाक वाला सीन, भारी कश्मकश वाला हो गया। थोड़ी देर में सहजता असहजता में बदल गई। राज को भी लगा कि आख़िर कब तक वो, वॉकी-टॉकी के एक साइड से बोलता रहे। दूसरी तरफ से सिग्नल वीक है या जान बूझकर स्विच ऑफ किया गया है, या शायद म्यूट पर है। कौन जाने, अचानक हम तुम फिल्म का वो गाना उसके दिमाग में गूँजने लगा – “लड़की क्यूँ जाने क्यूँ लड़कों सी नहीं होती”

राज की खुशी धीरे धीरे ग़म में बदल गई। अपनी एक तरफा बातचीत की फिज़ूल कोशिश के बाद उसके फिल्मी दिमाग ने उसे समझाया, उसे कुछ तो करना ही है, वरना उसकी कहानी शुरू होने से पहले ही खतम। सिमरन को भी झपकी आ गई थी। वो बीच की सीट पर बैठा अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी दुविधा में उलझा हुआ था। उसे लगा लव स्टोरी से पहले कॉमेडी ज़रूरी है, आख़िर बात भी तो चाय गिरने से ही शुरू हुई थी। उसके दिमाग की घंटी बजी। तभी उसने सिमरन के कन्धे पर थपकी देने के लिए हाथ बढ़ाया, और ठीक उसी पल सिमरन ने अपना चेहरा उसकी तरफ घुमाया और हाथ कन्धे की जगह उसके गाल पर जा लगा। सिमरन के चेहरे का एक्स्प्रेशन जो हो सो हो। राज पूरी तरह सकपका गया। इस बार उसके मुँह से “सोर्री सोर्री सोर्री” निकला। सिमरन ने कोई जवाब नहीं दिया। चुप रही, कुछ सेकण्ड्स राज को घूरा और उसकी आँखों ने ही फैसला सुना दिया। सोर्री की गुंजाइश नहीं थी। उसने अपना मुँह खिड़की की तरफ घूमा लिया और उसके बाद के सफ़र में दोनों की नज़रें फिर से नहीं मिलीं। रोनित अंकल मामला समझ गए, पर उन्होने भी चुप रहना बेहतर समझा। राज का मन तो हो रहा था की रोनित से सीट बदल ले, क्या बेवकूफी की, मज़ाक करने के चक्कर में खुद जोक बनकर रह गया। फिर खुद को समझाया – अब और कोई आइडिया नहीं, चुप होकर बैठे रहो और भूल जाओ इस किस्से को।“

एयरपोर्ट पर रोनित ने दोनों से विदा ली, राज का मन था कि एक आखिरी कोशिश करे, पर चाहकर भी नहीं कर पाया और एयरपोर्ट के एक्ज़िट गेट की तरफ़ चल पड़ा। दोनों के कदम खुद को एक बार फिर धीरे धीरे घसीट रहे थे। पर इस बार अलग अलग दिशा में। एक्ज़िट गेट से बाहर निकलते ही, राज के चेहरे पर लू वाली हवा का थप्पड़ लगा और वो वापस दिसंबर से जून में लौट आया। इस बार बैक्ग्राउण्ड में गाना था – तनहाई तनहाई मीलों हैं फैली हुई तनहाई..  तनहाई.. तनहाई..

आज पंद्रह साल हो गए इस बात को। जून की गर्मी से बचने को दोनों दार्जिलिंग में हैं। सिमरन राज से कह रही “राजेंद्र बाबू, बहुत हुआ शहर में रहना, यहीं दार्जिलिंग ही आ जाते हैं।“ राज टी गार्डेन को निहारता हुआ बोला – “चाय से ही अपनी कहानी शुरू हुई थी, वही जून का महीना, और हम चारों तरफ चाय की खुशबू के बीच। लेकिन इसमें वो बात नहीं जो उस फ्लोरल ड्रेस पहने लड़की की महक में थी। पर एक बात बताओ, जून की गर्मी में इतनी लंबी जुराबें कौन पहनता है? जैसे तुमने उस दिन पहनी थी” सिमरन मुँह बनाते हुई बोली – “हम पहनते हैं, तुम हर बार वही बकवास मत किया करो राजेंद्र बाबू, जैसा नाम वैसी बोरिंग बातें।  उस दिन मैंने तुम्हारी बेवकूफी वाली हरकत से पहले अगर अपना फोन नंबर टिशू पेपर पर लिखकर तुम्हारे बैग की साइड पॉकेट में नहीं डाला होता.. तो इस लव स्टोरी का द एंड उसी दिन हो जाना था।“

If you like audio stories, please check this story playlist on The Creative Zindagi Podcast

ये भी पढ़िये

Share
Share
Scroll Up