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जिजीविषा

नजदीक का नुकसान, दूर का फायदा | जिजीविषा की प्रेरणादायक कहानी
क्या सच में खुश रहने का कोई मंत्र होता है? जानिए इस अनोखी कहानी से, जिसमें है साहस, आत्मनिर्भरता और जीवन को खुलकर जीने की सीख।
A Short Hindi Story by Gaurav Sinha
Image Generated via an AI, story weaved by a human | जिजीविषा की प्रेरणादायक कहानी

आंटी, आप नब्बे की हैं, और फिर भी इतनी एक्टिव, और हम हैं कि अभी से बूढ़े हो गए हैं।

अरे बेटा ऐसा नहीं है, तुम लोगों की लाइफ आसान थोड़ी है, नौकरी, भागदौड़। मेरा क्या है? आराम से घर पर रहना होता है।

और पूड़ी लाऊँ? दो मिनट लगेंगे।

अरे आंटी आप रहने दीजिये, पहले ही आपने इतना कुछ खिला दिया है। – मन में और पुड़ियों के लालच को दबाते हुए, मेहमान होने का लिहाज करते हुए कहा।

आंटी दूर की रिश्तेदार थीं। आज किस्मत से उनके घर आना हुआ था। और उनको देखकर हम दोनों ही हैरान थे। कायदे से तो उनको अम्मा या दादी कहना ठीक होता। पर जिस तरह से वो जोश से भरी हुईं, खुद पूड़ीयाँ बनाकर खिला रही थीं। आंटी ज़्यादा सही लगा, उन्होंने। देखने में वो अस्सी के आसपास लग रही थीं, पर नब्बे तो बिल्कुल नहीं।

रुको, सब्जी बाकी है, और पूड़ी खत्म, लेकर आती हूँ मैं। मन से पेट भर कर खाओ। पहली बार आए हो घर। बोलकर आंटी किचन चली गईं।

इस बीच उनके भतीजे ने, जो की खुद रिटायर्ड टीचर थे, हमारे चेहरे पर मँडराते आश्चर्य को समझते हुए कहा –

चाची शुरू से ही ऐसी ही हैं, उन्हे अपना काम खुद करना पसंद है। अब भी नियम से योग और ध्यान करती हैं। टीवी पर फिल्में देखती हैं, पड़ोस के बच्चों की पक्की दोस्त हैं। सब उनसे अपनी पर्सनल बातें भी शेयर करते हैं। कौन अच्छा लगता है, किसका ब्रेक उप हुआ, कॉलेज में क्या चल रहा। वगेरह वगेरह। और हाँ प्यार से उनको ज़ीज़ी बुलाते हैं।

और सबसे अच्छी बात, हमेशा एक्टिव और खुश रहती हैं। मैंने आज तक उनके चेहरे पर कभी दुख या परेशानी नहीं देखी। शायद यही वजह है कि उनकी उम्र उनको आज तक पकड़ नहीं पाई, और एक हम हैं…

तभी आंटी ज़ीज़ी गरमा गरम पूड़ीयाँ अपनी नरम सी मुस्कान में लपेटकर आईं, और हमारी प्लेट फिर से भर दी गई।

आंटी ने हँसते हुए अपना फेवरिट डाइलॉग जिसे वो कई बार दोहरा चुकी थीं, एक बार फिर से कहा –

“नजदीक के फायदे में दूर का नुकसान हो सकता है, या फ़िर नजदीक के नुकसान में दूर का फायदा“

पेट भर खाना खा लो, वरना शरम के चक्कर में घर जाकर बनाना पड़ेगा तुमको…


घर वापस आते वक़्त समीर और मीरा, जिनकी हाल ही में शादी हुई थी, उन्हीं आंटी की बात करते रहे।

कमाल है, तुमने देखा एक अलग ही वाइब थी आंटी की, लगा ही नहीं कि हमसे पहली बार मिल रही हैं।

सच कहूँ जब पता चला था नब्बे साल की बुजुर्ग से मिलने जा रहे हैं तो मुझे लगा था, वो बिस्तर पर होंगी और हम हाल चाल पूछ कर वापस आ जाएंगे। पर वो तो कमाल हैं।

हाँ, मैं भी बहुत टाइम के बाद मिली उनसे। आँखों में चमक लिए बच्चों सी चहकती हुई मीरा बोली।

अच्छा है कि इसी शहर में हूँ। मैं वैसे भी इस शहर में ज़्यादा लोगों को जानती नहीं। महीने दो महीनों में मिल लेंगे।

घर पहुँचकर भी डिस्कशन का टॉपिक आंटी ही रहीं।


तुम्हें पता है, आंटी के हसबेंड की डैथ उनकी शादी के कुछ महीनों बाद ही हो गई थी।

सबने उनको बहुत समझाया, पर उन्होंने फिर कभी शादी नहीं की। और अपने मायके भी वापस न गईं।

अपने ससुराल की बेटी बन गईं, आगे की पढ़ाई की, गवर्नमेंट जॉब की, रिटायरमेंट के बाद एनजीओ में भी काम किया, अपने भतीजे भतीजियों और घर के सभी बच्चों को अपने बच्चों की तरह पाला।

अभी भी जिनके साथ रह रही हैं, उनके मम्मी-पापा नहीं रहे, तो वो आंटी को ही माँ मानते हैं।


अरे, मतलब ये तो 1950 के आसपास की बात होगी। लगता है हमारा समाज ज़्यादा प्रोग्रेससिव था तब।

वरना आजकल तो बिना बात के ससुराल वाले…

चलो, तुम भी कर लो योगा क्लासेस शुरू, और मेडिटेशन भी। जब देखो गुस्सा सवार रहता है नाक पर…

बस हो गए शुरू, मेरी नाक से पता नहीं क्या दुश्मनी है।

अरे दुश्मनी नहीं प्यार है…


उसके बाद से समीर और मीरा एक आध महीने में मौका निकालकर आंटी से मिल आते।

या यूँ कहें उनके हाथ का स्वादिष्ट खाना और उनके मुंह से निकली ज़िंदगी का रस लिए कहानियों का स्वाद उन्हे वहाँ खींच कर ले जाता।

धीरे धीरे, समीर और मीरा, जो यूँ तो उम्र में उनके पोते पोतियों से ज़्यादा बड़े नहीं थे, पर सबकी तरह आंटी के दोस्त हो गए।


मम्मी का फोन आया था… जिजीविषा आंटी नहीं रहीं। – बोलते बोलते मीरा की आँखें नम हो गईं।

अरे कैसे, वो तो कितनी फिट थीं। क्या हुआ?

कुछ महीनों पहले चोट लग गई थी, उसके बाद से चलने फिरने में थोड़ी तकलीफ थी। अब भी घूमने के लिए रैडि रहती थी।

कल रात सोयीं तो सुबह, नहीं उठी। हँसते हुए ही गईं हैं।

हम्म, चलो अच्छा हुआ, सुकून से रहीं और इससे पहले तकलीफ बढ़ती जाने का टाइम आ गया उनका। बस सेंचुरी रह गई।

हाँ ठीक ही हुआ, इस उम्र में हॉस्पिटल जाना ठीक नहीं होता…


समीर और मीरा को शहर छोड़े और आंटी से मिले तकरीबन पाँच साल हो चुके थे।

पर उनकी ख़बर आती रहती थी। एक साल और आधा दर्जन मुलाक़ातों में ही उन्होंने आंटी से बहुत कुछ सीखा था। और उनमें से सबसे ज़रूरी बात थी, चाहे जो कुछ हो, खुश रहने की कोशिश, और जो मन को अच्छा लगे वो करते जाना, बिना किसी का दिल दुखाए।

तुम्हें पता है मीरा, जिजीविषा आंटी ने मुझे एक बार अपनी कहानी डीटेल में बताई थी। जो शायद तुम्हारे घरवालों को भी न पता हो।

वो एक गरीब घर से थी, पर शादी ठीक-ठाक मिडिल क्लास परिवार में हुई। जब उनके पति एक बीमारी की वजह से जल्दी साथ छोड़ गए। उसके बाद, जैसा कि होता है, समाज में तरह-तरह की बातें हुईं।

उनसे कहा गया कि अपने पति के छोटे भाई से शादी कर लें, ताकि ससुराल में रह सकें। या फिर अपने मायके वापस जाएँ। वो जानती थी उनके घर वाले उनको घर वापस नहीं लाना चाहेंगे। पहले से ही बड़ी मुश्किल से गुज़र रहा था।


उनको आगे पढ़ना था, पति को खोने का दुख तो बस वही समझ सकती थीं। उनके पति ने उन्हें कह दिया था कि वो चाहते हैं कि वो जितना चाहें पढ़ें और नौकरी करें।

उस जमाने में ऐसी सोच रखना ही बड़ी बात थी। अपने देवर से शादी करना, उनको मंजूर नहीं था। वो तो उन्हे छोटा भाई मानती थी।

जब सारे रास्ते बंद थे तब उनके ससुर ने उनसे बात की और साफ साफ कहा।

“तुम इस घर की बेटी हो। जब तक चाहे, जैसे चाहे यहाँ रहो, जो चाहे फैसला करो, मुझे मंजूर है। दुनिया, समाज के कहने और दबाव में आकर कोई फैसला नहीं लेना है। तुम्हारा नाम ही जिजीविषा है, और तुम्हें अभी जीवन में बहुत कुछ करना है। तुम्हारा जीवन है, और फैसला भी तुम्हारा ही होगा।“


अपने ससुर से ऐसी बात सुनकर एक तरफ उनके मन से भारी बोझ हटा और दूसरी तरफ एक बड़ी दुविधा ने जन्म लिया।

आज़ादी हम सभी को पसंद है, पर जब कठिन फैसला लेने का वक्त आता है, तो कहीं न कहीं हम उससे बचना चाहते हैं। ताकि आने वाले समय में कुछ गड़बड़ हो तो किस्मत या दूसरों पर इल्ज़ाम लगाकर खुद को बेचारा साबित कर पाएँ।

पर जिसका नाम ही जिजीविषा हो, वो कहाँ घबराने वाली थी। उन्होने बहुत दिन सोच विचार करने के बाद मुश्किल नज़र आने वाला रास्ता चुना।

उन्होंने अपने ससुराल वालों को साफ-साफ बता दिया कि वो हमेशा उनके साथ ही उनकी बेटी बनकर रहेंगी। पढ़ेंगी, पढ़ाएंगी और घर के और दुनिया के सब बच्चे उनके अपने होंगे।

मीरा मुँह से ख़ुद-ब-ख़ुद निकला –

नजदीक का नुकसान और दूर का फ़ायदा चुना जिजीविषा ने…

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