
दरवाज़े के बाहर से आवाज़ें लगातार आ रही थी और घर में बिलकुल गहरा सन्नाटा।
दो बड़ी-बड़ी डबडबाई आँखें जिनमें आँसू जम से गए थे।
चेहरे पर मासूमियत और मायूसी ऐसी कि कठोर से कठोर इंसान के दिल को पिघला दे।
मन में डर, बेचैनी, घबराहट और दर्द के साथ एक ऐसा दुख
जो आपको जीते जी, निष्क्रिय कर दे।
आप चाह कर भी बोल न पाएँ,
मुंह खोलें भी तो बस दबी सी आह भर निकले
और उसी पल गुम हो जाए।
जिस घर में वो खुद को दुनिया में सबसे ज़्यादा महफूज़ महसूस करता है,
वही घर आज एक ऐसा बियाबान जंगल लग रहा है,
जहां खामोशी एक खतरनाक आदमखोर जानवर बन घात लगाए
उसको निगल जाने को तैयार है।
रुका हुआ वक़्त
पता नहीं कितना समय यूँ ही बीत गया।
उसे नहीं पता एक मिनट हुआ है, एक घंटा, एक दिन या एक साल।
उसके लिए समय रुका हुआ है।
खाना सामने है पर खाने की इच्छा नहीं।
क्या अब पूरी ज़िंदगी ऐसे ही अकेले रहना पड़ेगा?
क्या वो कभी लौट कर नहीं आएगी?
ऐसा क्या गलत कर दिया उसने?
उसकी कौन-सी बात बुरी लग गई?
वो तो हमेशा से ही ऐसा ही रहा है –
मनमौजी और बिंदास,
जो मन में आए कह देना,
टेढ़े मुंह बनाना,
प्यार से उसको जोकर भी तो वही कहती है।
किस बात का गुस्सा?
उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।
दिमाग चलना बंद हो चुका था।
आवाज़ें, उम्मीद और सूखी लकीरें
तभी बाहर से आवाज़ आई,
कुछ लोग आपस में बात करते हुए चले गए।
शायद उनको नहीं पता कि दरवाज़े की दूसरी तरफ़
एक मासूम अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुख झेल रहा है।
उसकी उम्मीद की डोर भी शायद बहुत कमजोर पड़ गई थी।
उसने अपनी जगह पर बैठे-बैठे ही
खुद को दिलासा देने की अधूरी सी कोशिश की।
डबडबाई आँखों से आँसुओं की बुँदे
चेहरे पर उतर कर सूखी लकीरें बना चुकी थीं।
ठीक वैसे जैसे सूखा पड़ने पर
नदियों में पानी नाम का होता है,
और उनके बीचों-बीच
रेत की बेतरतीब रेखाएँ उभर आती हैं।
धीरे-धीरे उसके दिल की धड़कन धीमी होने लगी
और साँस गहरी,
शरीर और मन दोनों जवाब दे चुके थे।
क्या वो अब कभी उससे नहीं मिलेगा?
क्या उसकी आज सुबह की मुलाक़ात आख़री होगी?
बस 10 मिनट
तभी दरवाज़े पर कुछ खटपट हुई,
ये आवाज़ जानी-पहचानी थी।
लगभग बंद आँखों की पलकें खुद-ब-खुद ऊपर उठीं।
दरवाज़ा खुला तो वो सामने खड़ी थी।
दोनों हाथों में कुछ सामान जो उसने साइड में रखा।
पर इतनी देर में
ये मायूस देवदास से दिखने वाले “जोकर” साहब
उछल-उछल कर उसके चारों तरफ़
जाने कितने चक्कर लगा चुके थे।
मानो किसी मुर्दा में जान फूँक दी गई हो।
बियाबान जंगल में रोशनी हो गई थी।
वो फिर से वही महफूज़ घर हो गया था।
मायूस आँखों में चमक देखते ही बनती थी।
जोकर ने अपने अंदाज़ में सारी शिकायतें कर डाली थीं
और सभी गीले शिकवे भूल भी गया था।
उसने जोकर को पुचकारते हुए कहा –
“बस 10 मिनट के लिए ही तो बाहर गई थी।
अच्छा सॉरी, आगे से नहीं होगी ये गलती।
और ये क्या, अभी तक खाना नहीं खाया।
चलो, खाना खत्म करो।”
बेज़ुबान का प्यार

मायूसी भुला चुका मासूम जोकर
फटाफट खाने में मग्न हो गया।
जिस दुनिया में उसके अपनों ने उसे कभी प्यार नहीं दिया,
ऐसे में इस बेज़ुबान के इस प्यार ने
उसे जीने का नया होसला दिया था।
उधर जोकर खाते हुए भी
पलट-पलट कर देख रहा था
कि कहीं फिर तो नाराज़ नहीं कर दिया मैंने।
उसकी इस हरकत पर
उस लड़की की आँखें भी डबडबाई—
मगर खुशी से।
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