Story

दो ज़िंदगियाँ, एक आईना

एक ने ‘हाँ’ कहा, एक ने ‘ना’… और दोनों की दुनिया बदल गई.. (Image Generated By AI)

“कब से देख रही हूँ आप मुझे घूरे जा रहे हैं। कोई तमीज़ है कि नहीं? इतने बड़े कॉलेज में सीनियर प्रोफेसर हैं आप।”
“ओह, सॉरी, आप मुझे ग़लत समझ रही हैं। मैं… मैं… मतलब मुझे लगा कि आपको पहले कहीं देखा है।”
“हद है, एक तो ग़लती ऊपर से फ़िल्मी डायलॉग! हद होती है बेशर्मी की।”
“नहीं, मैं सच कह रहा हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं आपसे पहले कब मिला हूँ, पर ये बात पक्की है कि हम पहले मिले हैं।”
“देखिए सर, माना कि मैं आपकी जूनियर हूँ, मगर आप ये मत समझिएगा कि मैं आपकी बदतमीज़ी बर्दाश्त करूँगी।”


नेहा, उम्र तक़रीबन पैंतीस साल, कॉन्फ़िडेंस से भरपूर, साइकॉलजी की असिस्टेंट प्रोफेसर। देश के सबसे बड़े और मशहूर कॉलेज में पहली जॉब। हाल ही में जॉइन किया है। स्टाफ़ रूम में देश के जाने-माने पॉलिटिकल साइंटिस्ट नकुल देव के इस अजीब व्यवहार से हक्का-बक्का रह गई। गुस्से में तमतमाते हुए, वो स्टाफ़ रूम से बाहर निकली और सीधा वीसी के ऑफ़िस में जाकर रुकी।

वीसी खुद एक बेहद सुलझी हुई महिला थीं और कई सालों से कॉलेज को अच्छे से मैनेज कर रही थीं। जब नकुल देव के बारे में नेहा की शिकायत सुनी तो हैरान हुईं। उनके चेहरे पर वो भाव आए मानो किसी चुनावी सभा में नेता ने अपनी ग़लतियाँ मान ली हों और लोगों से माफ़ी माँग ली हो। कुछ समय तक चुप रहने के बाद वीसी ने नेहा से कहा –
“नेहा, नकुल सर को मैं पिछले पंद्रह सालों से जानती हूँ। और मैं क्या, इस कॉलेज में कोई भी इस बात को नहीं मानेगा। हो सकता है तुम्हें कोई ग़लतफ़हमी हुई हो। लेकिन मैं तुम्हारी बात को इग्नोर भी नहीं कर रही। मुझे थोड़ा वक़्त दो, मैं खुद नकुल सर से बात करूँगी। आई होप यू अंडरस्टैंड। मुझे उनका पक्ष भी जानना होगा।”

“जी मैम, आप भी जानती हैं कि मैं गोल्ड मेडलिस्ट हूँ साइकॉलजी में। पास्ट में इंसान कैसा था, उससे ये फ़ैसला नहीं किया जा सकता कि आज भी वैसा ही है।”

“अरे बिल्कुल, मैं तो खुद फ़ैन हूँ तुम्हारी थीसिस की। तभी तो पहला मौका लगते ही तुम्हें यहाँ बुलाया। बेस्ट इंस्टीट्यूट नीड्स बेस्ट माइंड्स।”


इस वाकये को एक हफ़्ता हुआ। वीसी ने नेहा और नकुल देव दोनों के साथ पहले अलग-अलग और फिर एक साथ मीटिंग की। नकुल देव ने नेहा से माफ़ी माँगी और साथ ही कहा – “मैं अब भी वही बात कहूँगा। मुझे नहीं पता कि मुझे ऐसा क्यों लगता है कि मैं आपको जानता हूँ। मेरे पास इसका कोई लॉजिकल रीजन नहीं है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। पर हाँ, मेरी वजह से आपको परेशानी हुई, उसके लिए मैं शर्मिंदा हूँ। इरादा चाहे न रहा हो, परेशानी तो परेशानी ही है। हम अगर शिक्षक होकर अपनी ग़लती नहीं मानेंगे, तो किसी को पढ़ाने का हमें कोई हक़ नहीं।”

इस दौरान नेहा ने और भी स्टाफ़ मेंबर्स और स्टूडेंट्स से नकुल देव के बारे में जानने की कोशिश की। कहीं से भी ऐसा कुछ सुनने को नहीं मिला कि उन पर शक किया जाए। उनका व्यवहार हमेशा से मर्यादित रहा है और उनका ज़्यादातर काम भी महिला उत्थान को लेकर ही रहा है। वो इस बात पर ज़ोर देते आए हैं कि लड़कियों को बाकी फ़ील्ड्स की तरह पॉलिटिक्स में भी आगे बढ़कर आना होगा। तभी बड़ा बदलाव संभव है।

पहले दिन के उस फ़िल्मी ड्रामे के बाद धीरे-धीरे चीज़ें नॉर्मल होना शुरू हुईं। नेहा और नकुल देव के बीच उम्र का फ़ासला बेशक बड़ा था मगर वैचारिक तौर पर दोनों हमउम्र थे। नकुल देव का जीवन और समाज का अनुभव और नेहा की ह्यूमन साइकॉलजी पर पकड़ के कारण दोनों की बौद्धिक दोस्ती हो गई।

अक्सर लाइब्रेरी और स्टाफ़ रूम में दोनों घंटों चर्चा करते रहते। एक दिन ऐसे ही चर्चा ने बहस का रूप ले लिया। क्योंकि नकुल देव एक नारीवादी के तौर पर जाने जाते थे, नेहा कोई मौका नहीं जाने देती थी उनके मन की ऊपरी सतह को कुरेदकर भीतर छिपे विचार को बाहर लाने का।

“सर, आप चाहे जितना मर्ज़ी फ़ेमिनिस्ट होने का दावा करें, अंदर ही अंदर आप पितृसत्ता लिए घूम रहे हैं। आप अपने बच्चों के बारे में फ़ख़्र से बताते हैं, उनकी पढ़ाई और उपलब्धियाँ गिनवाते हैं। पर आज तक मैंने आपको अपनी पत्नी के बारे में कुछ कहते नहीं सुना। अगर वो एक हाउसवाइफ़ भी हैं, तब भी आपको उनकी क़दर होनी चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे आपको अपने बच्चों की है।”

नेहा इतनी ज़ोर से बोली कि स्टाफ़ रूम में सभी की गर्दन और आँखें उसी पर टिक गईं।

आमतौर पर विचलित न होने वाले नकुल देव उस पहले दिन के वाकये के बाद आज एक बार फिर से लाजवाब थे। उन्हें समझ में नहीं आया क्या कहें। कुछ देर नेहा की शक्ल देखते रहे और फिर चुपचाप उठकर बाहर चले गए।

स्टाफ रूम में फुसफुसाहट हुई और फिर पिन-ड्रॉप साइलेंस।
नेहा ने मन ही मन सोचा –
“क्या आज मैंने कुछ ज़्यादा तो नहीं बोल दिया? पर्सनल अटैक नहीं करना चाहिए था। मुझे क्या पता उनकी लाइफ़ में क्या है, क्या नहीं।”

और फिर, गहरी सांस लेते हुए अपने विचारों को समेटकर खुद को समझाया –
“अब बोल दिया तो बोल दिया। कुछ ग़लत तो नहीं बोला। नारी उत्थान की बात करने वाले लोग अगर नारी की बातें ही न सुन पाएँ तो क्या ख़ाक फेमिनिस्ट हैं वो।”


नकुल देव के दिमाग़ में मानो एक-के-बाद-एक विस्फोट होते जा रहे थे।
उन्होंने अपने सारे लेक्चर कैंसिल किए और सीधे घर के लिए निकल गए।
इत्तेफ़ाक़न, गाड़ी भी एक-के-बाद-एक ट्रैफ़िक लाइट में अटकते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

नकुल देव ने ड्राइवर से एसी बंद करने को कहा और खिड़की का ग्लास नीचे कर दिया। गर्दन लगभग बाहर निकालते हुए गहरी सांस ली। नेहा की कही हुई बातें मानो गले में फंदे की तरह लिपटी थीं और वो घुटन महसूस कर रहे थे।

गाड़ी जितनी धीरे चल रही थी, उनके दिमाग़ में सोच उतनी ही तेज़। कब वो सत्रह साल पीछे चले गए, पता ही नहीं चला।

पढ़ाई करते-करते उन्हें ये ख्याल ही नहीं रहा था कि घर भी बसाना है। फिर एक बार गाँव गए तो नीलिमा के घर वाले उन्हें देखने आए। नीलिमा की तस्वीर दिखाई गई और उन्होंने हाँ कर दी।

“किसी-न-किसी से तो शादी करनी ही है, तो नीलिमा क्या बुरी है। बारहवीं पास है, देखने में सुंदर है, हाँ उम्र थोड़ी कम है। पर जब उसके माँ-बाप को दिक़्क़त नहीं तो हम क्यों मना करें।”

नीलिमा से औपचारिकता के लिए एक मुलाक़ात हुई और उसने भी हाँ कर दी। आनन-फ़ानन में शादी हुई। शहर आए और देखते-ही-देखते तीन साल में दो बच्चे हो गए।

नकुल देव का मन था नीलिमा को आगे पढ़ाएँ, पर बच्चों की देखभाल में कब समय निकल गया, उन्हें पता ही नहीं चला। नीलिमा ने भी हँसी-ख़ुशी घर संभाला, कभी कोई शिकायत नहीं की।


“पर आज तक मैंने आपको अपनी पत्नी के बारे में कुछ कहते नहीं सुना। अगर वो एक हाउसवाइफ़ भी हैं, तब भी आपको उनकी कदर होनी चाहिए…”
नेहा की आवाज़ उनके दिमाग़ में फिर से गूंजी।

“क्या ग़लत कहा नेहा ने? शादी के बाद मेरी ज़िंदगी में कोई फ़र्क नहीं पड़ा। मैं पढ़ता रहा, पढ़ाता रहा, नाम कमाता रहा। घर के बाहर नारीवाद, महिला उत्थान के लेक्चर देने वाला मैं… क्या मैंने कभी कोशिश की अपनी पत्नी को समझने की? वो आज भी बारहवीं पास है। शायद यही कारण है कि वो सिर्फ घर, बच्चों और किचन को ही अपनी दुनिया बनाए हुए है और कभी मेरे साथ बाहर भी नहीं आना चाहती।”

दिमाग़ी उथल-पुथल और ख्यालों के टाइम ट्रैवल में वो कब घर पहुँचे, उन्हें पता ही नहीं चला।


“अरे, आज इतनी जल्दी आ गए आप? तबीयत तो ठीक है आपकी?” – नीलिमा ने परेशान मगर दबी आवाज़ में पूछा।
नकुल देव बिना कुछ कहे अपने रूम में चले गए।

नीलिमा चुपचाप किचन में गई और चाय बनाने लगी।
स्टाफ रूम की फुसफुसाहट और दबी-दबी हँसी की आवाज़ें रह-रह कर नकुल देव को चिढ़ा रही थीं।

चाय पीते-पीते नकुल देव ने कहा –
“सुनो, इस संडे मैं स्टाफ वालों को लंच पर बुलाने की सोच रहा हूँ। कोई पंद्रह-बीस लोगों का खाना रहेगा। तुम इतना नहीं कर पाओगी… तो एक दिन के लिए कुक का इंतज़ाम कर लो। कितनी बार कहा है, तबीयत ठीक नहीं रहती तो खाने बनाने के लिए किसी को रख लो। लेकिन तुम्हारी दुनिया तो किचन ही है। पहले बच्चों का बहाना था, अब तो वो बड़े हो रहे हैं, अब क्या बहाना है? अपना ध्यान दो।”

नीलिमा चुपचाप सुनती रही और बोली –
“पंद्रह लोगों का खाना क्या बड़ा काम है? पिछली दिवाली में भी आपके भाई-बहन और उनके बच्चे आए थे, तब मैंने अकेले संभाला था। आप चिंता मत करो, बस कितने लोग वेज और कितने नॉन-वेज हैं, इतना बता देना मुझे।”

नकुल देव गौर से नीलिमा के चेहरे को देखते रहे।
“जब शादी हुई थी तो नीलिमा मुझसे पंद्रह साल छोटी थी। आज वो मेरी ही उम्र की लगती है।”

दिमाग़ में फिर से उथल-पुथल शुरू हुई। कहीं-न-कहीं उन्होंने खुद को कठघरे में खड़ा पाया। और जो भी बचाव अपने पक्ष में पेश किए, वो खुद को ही तर्कहीन और बेतुके लगने लगे।


नीलिमा ने एक दिन पहले से ही लंच की तैयारी शुरू कर दी थी। उधर नकुल देव ने भी सबको लंच का न्योता दे दिया था। सभी स्टाफ वाले हैरान थे, इससे पहले कोई भी नकुल सर के घर नहीं गया था। नेहा खुश थी कि चलो वो नकुल देव को ट्रिगर करने में कामयाब रही थी उस दिन।

“अरे नेहा, आप सबसे पहले आ गईं।” – नकुल देव ने स्वागत करते हुए कहा।

“और नहीं तो क्या सर, मेरा तो मन था सुबह ही आ जाऊँ और नीलिमा जी को आपके फिल्मी डायलॉग वाली कहानी सुनाऊँ।” – कहकर नेहा ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।

नकुल देव थोड़ा झेंपते हुए बोले –
“हाँ हाँ क्यों नहीं, मैंने कब मना किया। आज खुलकर पता कर लीजिए कि मैं कितना बड़ा ढोंगी हूँ।”

नेहा ने नीलिमा को देखा तो कुछ अजीब-सा लगा। और वो उसे देखती ही रह गई। फिर बोली –
“क्या हम पहले भी कहीं मिले हैं? मैंने शायद आपको कहीं देखा है।”

ये सुनकर नकुल देव ठहाके लगाने लगे –
“अरे ये तो मेरा डायलॉग था, आपने चुरा लिया… और वो भी मेरी ही पत्नी के लिए। अब मैं किससे शिकायत करूँ? वीसी मैडम तो आज लंच पर आ नहीं पाईं, वरना वो गवाह होतीं मेरी बेगुनाही की।”

लंच ख़त्म हुआ। सबने नीलिमा के खाने की तारीफ़ की और उनको अगले कॉलेज इवेंट में आने को कहा। सब चले गए, पर नेहा जो सबसे पहले आई थी, वो रुकी और नीलिमा की मदद करने लगी। नीलिमा ने मना किया पर वो नहीं मानी।

नकुल देव को किसी सेमिनार में जाना था तो वो भी चले गए।


बातों-बातों में नेहा ने पहली बार नकुल देव के साथ घटी फिल्मी कहानी और स्टाफ रूम वाला किस्सा सुनाया। नीलिमा हैरान थी कि कैसे कोई अंजान आदमी से ऐसे लड़ सकता है, चिल्ला सकता है। मैं तो अपने पति के सामने ही मुँह नहीं खोल पाती।”

नेहा ने नीलिमा से पूछा –
“तो आप लोगों की लव मैरिज है?”

सुनकर नीलिमा मुस्कुराई –
“अरे कहाँ… हमारे गाँव में कहाँ ये सब। वो तो इनके परिवार को मैं पसंद आ गई, और शादी करके यहाँ आ गई। ये मुझसे पंद्रह साल बड़े हैं। जिस दिन इनसे मिली थी मुझे लगा था कि मुझे मना कर देना चाहिए। मेरा मन था पढ़-लिखकर डॉक्टर बनने का। बारहवीं में मेरे नंबर भी अच्छे थे। सोचा था शादी के बाद पढ़ लूँगी। पर फिर दो बच्चे हो गए और पता ही नहीं चला।

आज तुमको देखा तो जाने क्यों अजीब-सा लगा। लगा, काश मैं भी तुम्हारे जैसी होती – अपने मन की बात खुलकर कहने वाली। पर अब चाहकर भी किचन के अलावा मेरा मन कुछ और करने का नहीं लगता। पता नहीं कितने सालों बाद किसी से इतना खुलकर बात कर रही हूँ। तुम पीजी में रहती हो… वहाँ खाना अच्छा नहीं होता होगा…”

नेहा, जिसने न जाने कितनी किताबें पढ़ी थीं, देश-विदेश घूमी थी, आज जो महसूस कर रही थी, खुद को भी नहीं समझा पा रही थी। नीलिमा उसकी हमउम्र थी। पहले नकुल देव को ये लगा था कि वो उसे जानते हैं और आज नीलिमा से मिलकर नेहा को लगा कि वो खुद से ही बात कर रही है।

क्या सच में कई दुनिया एक साथ, एक समय में चल रही हैं?

उसने अचानक नीलिमा से रैपिड-फायर मोड में सवाल करने शुरू किए –

– “आपका जन्मदिन 1 जनवरी 1990 है?”
– “हाँ।”
– “आप कमालपुर गाँव से हो?”
– “हाँ।”
– “आपकी नकुल देव से पहली मुलाक़ात नवंबर 2008 में हुई थी?”
– “हाँ।”
– “जिस दिन आप नकुल देव से मिली थीं, उस दिन आपकी दादी ने आपको शादी से मना किया था? पर रात भर सोचने के बाद आपने ‘हाँ’ कर दी थी?”
– “हाँ, हाँ सब सही है… लेकिन तुमको ये सब कैसे पता? हम तो पहली बार मिले हैं? क्या नकुल जी ने बताया ये सब? वो बोल रहे थे कि नेहा दिमाग पर रिसर्च करती है। क्या ये वैसा गेम है… जैसे वो एक लड़की है न… क्या नाम है… ‘सुहानी शाह’? जो जादू से सब कुछ बता देती है। हाँ… याद आया – मेंटलिस्ट? क्योंकि ये तो मैंने आज तक किसी को भी नहीं बताया… नकुल जी को भी नहीं।”

नेहा मुस्कुराई और बोली –
“अरे नहीं नीलिमा, मुझे इसलिए पता है क्योंकि उस दिन तुमने तो ‘हाँ’ कर दी थी, पर मैंने शादी के लिए ‘ना’ कहा था। और, अगले ही दिन परिवार से लड़कर, दादी की रज़ामंदी से शहर पढ़ने आ गई थी।

आज तुमसे मिलकर लग रहा है कि मेरा फ़ैसला सही था। पीजी का खाना उतना भी बुरा नहीं, किचन से आगे सोच सकती हूँ। लोगों को उन्हीं की ज़ुबान में जवाब दे सकती हूँ। हाँ, अभी तक शादी नहीं की। शायद न भी करूँ, या कर भी लूँ। अभी समय है… शादी के लिए भी, बच्चों के लिए भी।”

नीलिमा बिना पलकें झपकाए चुपचाप सुनती जा रही थी, मानो हिप्नोटाइज़्ड हो।

नेहा ने आगे आकर नीलिमा को ज़ोर से गले लगाया और कहा –
“नीलिमा, अभी भी ज़िंदगी में बहुत कुछ बचा है। बस कभी-कभी ‘ना’ कह दिया करो। और क्या कमाल का टेस्टी खाना बनाती हो। मास्टरशेफ में जाओ, मेरा वोट पक्का।”

और हाँ, नकुल सर से कहना, उन्होंने सही कहा था – वो मुझे बहुत पहले से जानते हैं।

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