
मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही वो पार्किंग की तरफ़ बढ़ गई। कम से कम 500 साइकिल वहाँ खड़ी थीं। उसने एक साइकिल निकाली और अपने कॉलेज की तरफ़ चल पड़ी।
मॉनसून का सीज़न चल रहा था, तो सड़कें गीली थीं, पर पूरी तरह साफ़। सड़क के दोनों तरफ़ घने पेड़ थे। मेट्रो के पिलर्स और फ्लाईओवर्स पर भी हरी-हरी बेलें लिपटी थीं। लगभग हर बिल्डिंग पर वर्टिकल गार्डन बने हुए थे। चारों तरफ़ फूलों, बरसात और पेड़ों की मिली-जुली भीनी खुशबू फैली हुई थी।
सड़क पर कार से ज़्यादा बसें और पब्लिक ट्रांसपोर्ट था। वॉकिंग ट्रैक और साइकिल लेन गाड़ियों की लेन से अलग बने थे और उनमें लोग ज़्यादा थे। साइकिल से उसे कॉलेज पहुँचने में पंद्रह मिनट लगे होंगे। मेट्रो स्टेशन से दूरी ज़्यादा नहीं थी।
जैसे ही कॉलेज के गेट पर पहुँची, पाँच-छह लड़कों का ग्रुप वहाँ खड़ा था। उसने लड़कों की तरफ़ देखा, तो सभी उसे देखकर मुस्कुराए और हवा में हाथ लहराया। वो भी हाथ लहराते हुए मुस्कुराई और आगे बढ़ गई। साइकिल पार्क करके अपनी क्लास पहुँची।
“नई” दिल्ली 2050
साल 2050 और शहर का नाम है नई दिल्ली। इस साल फिर से दुनिया का सबसे साफ़ शहर होने का ख़िताब दिल्ली को मिला है। AQI इंडेक्स पचास से कम ही रहता है और टूरिस्ट सिर्फ़ इसलिए इस शहर में आते हैं कि कुछ दिन यहाँ रहकर तरोताज़ा महसूस कर सकें।
वैसे वजह और भी हैं—शहर चौबीस घंटे चलता है, लेकिन बहुत कम रफ़्तार से। लड़कियाँ कहीं भी बेख़ौफ़ घूमती हैं, उन्हें किसी से कोई डर महसूस नहीं होता। क्राइम रेट भी साल-दर-साल कम होता जा रहा है।
शहर में सैकड़ों तालाब हैं और उनमें से कुछ को तो यमुना नदी से जोड़ दिया गया है। शाम को लोग अक्सर पार्क में घूमते दिखते हैं या बोटिंग करते हुए।
प्रिविलेजड
क्लास खत्म कर रुख़साना प्लेग्राउंड में पहुँची और एथलेटिक्स की प्रैक्टिस करने लगी। उसके दोस्त अजय, रिचा, अवतार, सोहेल भी साथ आए और अलग-अलग गेम्स की प्रैक्टिस में लग गए।
स्पोर्ट्स ज़रूरी है स्कूल और कॉलेज में। पचास प्रतिशत ग्रेडिंग उसी के बेसिस पर होती है।
कॉलेज की प्रिंसिपल रिटायर हो रही थीं और कुछ ही देर में उनका फ़ेयरवेल फ़ंक्शन था। रुख़साना अपने दोस्तों के साथ गेम्स की प्रैक्टिस के बाद सीधे फ़ंक्शन में पहुँची। सबने जाकर आगे की सीटों पर फ़टाफ़ट कब्ज़ा कर लिया। सेमिनार हॉल पूरा भर चुका था।
प्रिंसिपल मरियम ने आकर एक छोटी सी स्पीच दी और फिर सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू हुआ। बच्चों ने एक-एक कर सवाल पूछने शुरू किए—
- आपको कैसा लग रहा है?
- कल से आप कॉलेज नहीं आएँगी, तो क्या रूटीन रहेगा?
- रिटायरमेंट के बाद आप पढ़ाना बंद कर देंगी?
मरियम ने एक-एक करके सबके जवाब दिए।
माइक पास होते-होते रुख़साना के पास पहुँचा तो उसने सवाल किया –
“मरियम, आप हमेशा हमें बोलती हैं कि आज जो कुछ है, it’s a privilege.
हमने इंटरनेट पर बहुत कुछ देखा और पढ़ा है, पर we want to hear your thoughts.
How were your growing-up years? And why are we privileged?”(आपके क्या विचार हैं, आपके समय शहर कैसा था और हम क्यों खुद को खुशकिस्मत समझें?)
यादें (DYSTOPIA)
मरियम ने रुख़साना को गौर से देखा और एक हल्की सी… दबी हुई मुस्कान उनके चेहरे पर पसर गई। आँखों में धुंधली सी चमक उठी – शायद खुशी के आँसुओं की वजह से, या फिर किसी दबे हुए ग़म की वजह से।
रुख़साना के दोस्तों ने उसकी तरफ़ घूरा, मानो कह रहे हों—
“ऐसा क्या पूछ लिया कि प्रिंसिपल को फ़ेयरवेल के दिन रुला दिया?”
मरियम ने खुद को सँभालते हुए बोलना शुरू किया—
“कोई पच्चीस साल पहले, मैंने अपनी पीएचडी की थी environmental sustainability में। मेरे पास कई देशों से रिसर्च और टीचिंग के ऑफ़र थे। लेकिन मुझे यहीं रहकर कुछ करना था।
उस वक़्त ये शहर ऐसा नहीं था। बारिशों में सड़क पर चलना मुश्किल होता था। यमुना नदी का पानी इतना गंदा था कि उसके पास से निकलते वक़्त सांस लेना मुश्किल हो जाता। Pollution level पूरे वर्ल्ड में सबसे ज़्यादा था।”
“और हाँ, सड़क पर एक भी साइकिल नहीं दिखती थी। सिर्फ़ कार, बस, टैक्सी और बाइकें। कहीं जाना हो तो कम से कम दो घंटे लगते।
ऐसे में मैंने एक NGO के साथ सफ़ाई का काम शुरू किया और यमुना नदी व सड़कों पर फैली गंदगी को साफ़ करने लगी।
एक बार घर लौटने में देर हुई। बस में मैं अकेली थी। कुछ नशे में लड़के आकर मेरे साथ बदतमीज़ी करने लगे।
प्रदूषण सिर्फ़ हवा और पानी में नहीं था, लोगों के दिमाग़ में भी था। लड़कियाँ खुद को सेफ़ महसूस नहीं करती थीं। उस दिन मुझे लगा कि आज अनहोनी होकर रहेगी। मगर तभी बस रुकी, कुछ और लोग चढ़े और ड्राइवर ने सारा मामला देखकर बस रोकी रखी। पीछे आकर उन बदमाशों को भगाया।
डर से काँपती हुई मैं किसी तरह घर पहुँची। घरवालों ने सब समझ लिया और साफ़ कहा – ‘अब यहाँ रहने की ज़रूरत नहीं। बहुत हुई समाज सेवा। सड़क की गंदगी साफ़ हो भी जाए, लोगों के गंदे दिमाग़ को कैसे साफ़ करोगी?’
मुझे भी लगा कि ऑफ़र स्वीकार करके बाहर चली जाऊँ। मगर कुछ दिन सोचने के बाद फ़ैसला लिया कि मेरी ज़रूरत यहीं है।”
आपदा में अवसर (Courage to Change)
मरियम आगे बोलीं—
“शहर के हालात हर साल बिगड़ते चले गए। गंदगी, प्रदूषण, क्राइम अगेन्स्ट वुमेन, communal clashes… कुछ रुक नहीं रहा था।
बीस साल पहले इस शहर में वो सब हुआ जो सिर्फ़ मूवीज़ में देखने को मिलता है। जून की गर्मी में तापमान 55 डिग्री हुआ, और जुलाई में दंगे, जिसमें हज़ारों लोग मारे गए।
उसके बाद लगातार 20 दिन बारिश हुई, cloudburst हुए। पूरा शहर तहस-नहस हो गया। घरों में नाले का पानी, बीमारियाँ, संसद तक में कचरा तैर रहा था।
लोग जो बाहर से काम करने आए थे, वे अपने घर लौट गए, मगर हाल हर जगह एक सा था। हिमालय में पहाड़ गिर रहे थे। पुल, घर और पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर जिसकी नींव भ्रष्टाचार पर बनी थी, सब ढह गया।”
जाग उठा इंसान (Awakening)
“एक साल में शहर और देश ने वो बरबादी देखी जो कभी सोची भी नहीं थी। जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब इंसान की अक्ल ठिकाने आती है।
सरकार, प्रशासन और लोगों को समझ में आया कि अब तक वे एक-दूसरे को और प्रकृति को बेवकूफ़ बना रहे थे।
और इन सबसे बचने का एक ही तरीका था – खुद को पूरी तरह बदल देना।
लाखों लोग मारे गए, तब जाकर बदलाव शुरू हुआ।
यह जो सेमिनार हॉल है, उस साल पूरा बर्बाद हो गया था। यह सब दोबारा बना। पूरे देश में लोगों ने साथ मिलकर प्रोजेक्ट्स पर काम किए। छोटे शहरों और गाँवों पर फोकस पहले दिया गया।
बरबादी ने लोगों के दिमाग़ से नफ़रत और गंदगी भी साफ़ कर दी। और यह सब होने में पाँच साल से भी कम समय लगा… क्योंकि कोई दूसरा विकल्प ही नहीं था।”
बदलाव (Transformation)
“ग्लोबल वार्मिंग का असर भी धीरे-धीरे कम होने लगा। क्योंकि यही हाल लगभग हर देश का हुआ था। सबने आपसी लड़ाई-झगड़े भूलकर एक साथ काम किया।
लेकिन जिस शहर ‘दिल्ली’ और देश ‘इंडिया’ का हाल सबसे बुरा था, आज वही सबसे ज़्यादा चमक रहा है।
आप लोगों में से ज़्यादातर ने उस समय जन्म लिया जब यह शहर और यह देश इंसानों के रहने लायक बनना शुरू हुआ।
तो अब सोचो—आप सब privileged हो या नहीं?”

आज़ादी (:
जैसे ही स्पीच खत्म हुई, बहुत देर तक हॉल में सन्नाटा रहा। बच्चे धीरे-धीरे बाहर निकले।
रुख़साना और उसके दोस्त अपनी-अपनी साइकिल के साथ पैदल ही चल पड़े। तभी हल्की-हल्की बारिश शुरू हुई। सबने एक साथ आसमान की तरफ़ देखा और बूंदों को अपने चेहरे पर महसूस किया।
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