
दिसम्बर का सर्द महीना, रात के तकरीबन 11 बजे का समय, दिल्ली में कहीं एक बस स्टॉप। स्ट्रीट लाइट की रोशनी, जिसमें ठीक ठाक देखा जा सकता है। बस स्टॉप पर एक लड़की, उम्र तकरीबन पच्चीस से तीस के बीच। पहनावे और हाव भाव से किसी बड़ी कंपनी में काम करने वाली वर्किंग प्रॉफेश्नल। लड़की के चेहरे पर एक निश्चिंतता है, जो जगह, वक़्त और समय के हिसाब से कुछ अजीब है। लड़की बस स्टॉप के बैंच पर बैठी है, थोड़ी थोड़ी देर के बाद अपनी जगह से उठकर टहलती है, और फ़िर वापस जाकर बैंच पर बैठ जाती है। धीरे धीरे सड़क पर चहल पहल कम होती जा रही है। इक्का दुक्का गाडियाँ निकल रहीं हैं। बस या ऑटो का नामो निशान नहीं, सड़क पर कुछ आवारा कुत्ते और वैसे ही लोग – जो लड़की को घूरते हुए जा रहे। अचानक एक गाड़ी रुकी, और खिड़की का शीशा नीचा हुआ। कुछ मनचले लड़कों ने भद्दी बातें कहीं। लड़की अभी भी बिलकुल शांत, जैसे कुछ हुआ ही न हो। इतने में पीछे से एक ऑटो आकर रुका और उसमें से एक अधेड़ उम्र का ड्राईवर बाहर निकला। जिसका डील डॉल किसी पहलवान सा था। ऑटो ड्राईवर ने चीखते हुए, दो चार गालियां दी और मनचलों का सारा भूत उतर गया। गाड़ी ने स्पीड पकड़ी और वो रफूचक्कर।
ये सब होते देख लड़की अब भी बिलकुल शांत, मानो उसे न कुछ सुनाई दिया हो न दिखाई। ऑटो ड्राईवर लड़की की तरफ पलटा और बोला – “मैडम चलिये मैं आपको घर छोड़ देता हूँ, इस रूट पे अब आपको बस नहीं मिलेगी और एरिया ठीक नहीं, ये आवारा तो डरपोक थे… थोड़ी देर में जाने कैसे कैसे लोग गुज़रें। वो तो अच्छा है मैंने देख लिया… वरना तो इधर रोज़ कोई न कोई कांड होता रहता है। अभी परसों ही इसी बस स्टॉप के पीछे झाड़ियों में एक लड़की की लाश मिली थी… बहुत बुरी हालत में… लोग जानवर हो गए हैं आजकल। बिलकुल सेफ नहीं ये शहर, कहने को राजधानी है, पर इससे बढ़िया तो गाँव में सेफ़्टी होती है।“
इतना कुछ कहने के बाद भी लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया, उल्टा उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान उभरी। ऑटो ड्राईवर ने जब उसके चेहरे को ठीक से देखा तो एक सेकंड के लिए वो हट्ठा कट्ठा, पहलवान सा दिखने वाला आदमी भी अनजाने डर से सिहर गया। लड़की की आँखें उसे घूर रही थी, बड़े से चश्में से झाँकती बड़ी बड़ी आँखें, अँधेरे में भी अलग से चमकता हुआ चेहरा, होठों पर मरून कलर की करीने से लगाई गई लिपस्टिक… बाल अच्छे से बने हुए… पैंट शर्ट और कोट बिलकुल साफ सुथरे। मानो किसी एयर कंडीशन रूम में तैयार होकर कोई बैठा हो। सड़क पर पाँच मिनट भी कोई चल ले तो, तो चेहरे पर दिख जाता है। पर ऐसी बड़े घर की अमीर लड़की, यहाँ बस स्टॉप पर अकेले? ऑटो ड्राईवर के अंदर से आवाज़ आई – “मत पड़ इस चक्कर में, मदद करने के कीड़े और दो चार सौ रुपये के चक्कर में कहीं ऐसी की तैसी न हो जाए, जैसे हँस रही है, या तो पागल है, या जानबूझकर लोगों को फँसाने के लिए बैठी है, कौन जाने कौन है, क्या बला है… आजकल किसी का क्या भरोसा…”
ऑटो ड्राईवर पलटा, जाकर ऑटो स्टार्ट किया। जितनी जल्दी यहाँ से निकले उतना अच्छा। यहीं लाश भी तो मिली थी पता चले कोई ऊपरी साया हो। मन ही मन भगवान का नाम लेना शुरू किया, हनुमान चालीसा याद आई, और भी आठ-दस देवी देवताओं को नींद से जगाया। वो भी ऊपर से देख कर कह रहे होंगे – “घोर कलयुग है, एक योद्धा रूपी पुरुष, एक अबला नारी से डरकर, हमें परेशान कर रहा है इतनी रात को। वो भी जंबू द्वीप की राजधानी में, जहाँ से स्त्रियों की ही प्रार्थनाएँ सुनने को मिलती हैं, ये तो कलयुग का भी कलयुग हो गया।”
ऑटो ड्राईवर ने एक्सलरेटर पर पैर रखा ही था कि पीछे से एक आवाज़ आई, जो चीरते हुए उसके कानों से टकराई – “आप मुझे इतनी रात इस सुनसान जगह पर अकेला छोड़ कर चले जाएंगे, मुझे तो लगा था आप मेरी हेल्प करोगे” अब तक चुप बैठी उस लड़की ने आखिर कुछ बोला, ये सुनकर ऑटो ड्राईवर का डर कम होने की बजाए और बढ़ गया। लड़की की आवाज़ में कोई घबराहट नहीं थी। बल्कि एक खिलवाड़ था, जैसे कोई अपने प्रेमी को रिझाने या चिढ़ाने के लिए बात कर रहा हो, एक ताना था, मानो कह रही है – “कैसे डरपोक आदमी हो, एक सुंदर जवान लड़की, खुद सामने से ऑफर दे रही है, बिलकुल तैयार है तेरे गले पड़ने को और तू डर कर भाग रहा है।”
बड़ी हिम्मत करके ऑटो ड्राईवर ने खुद को संभाला और ऑटो से उतर कर वापस लड़की के पास गया। लड़की ने उसे साथ बैंच पर बैठने का इशारा किया, और वो चुप चाप बैठ भी गया। मानो हिप्नोटाइज़ हो गया हो। या शायद होने का नाटक कर रहा था। उसके दिमाग में लड़की की वो बात घूम रही थी –“आप मुझे इतनी रात इस सुनसान जगह पर अकेला छोड़ कर चले जाएंगे, मुझे तो लगा था आप मेरी हेल्प करोगे” कैसे कोई मर्द इतना अच्छा मौका जाने दे हाथ से। शायद उसकी लौटरी लग गई आज। ऐसा तो बस फिल्मों में होता है। और क्या ही बिगाड़ लेगी ये अकेली लड़की उसका। जब किस्मत आकर दरवाज़ा खटखटका रही हो तो ज़्यादा सोचने से नुकसान ही होता है, क्या पता कब दूसरे चौखट पर दस्तक देने चली जाये।
“मैडम आप अकेले इस वक़्त ऐसी सुनसान जगह पर। क्या हुआ, क्या आपकी गाड़ी खराब हो गई? कहाँ जाना है आपको, मैं लिए चलता हूँ, बीस सालों से ऑटो चला रहा हूँ, दिल्ली का चप्पा चप्पा जानता हूँ। फट से पहुँचा दूंगा आपको।“
“अच्छा तो दिल्ली का चप्पा चप्पा जानते हो आप। मदद तो चाहिए मुझे, पर घर जाने का मन नहीं मेरा। वैसे, बीस सालों में कितनी लड़कियों को लिफ्ट दी है आपने रात को? कहाँ कहाँ छोड़ा है। उनके ही घर ले जाते हो या, कहीं और?”
“मतलब, क… क्या… क्या… मतलबब… है आपका। मैं शरीफ इंसान हूँ, बाल बच्चे दार, दस साल की बच्ची है मेरी, बीवी भी है घर पर। आपको देखा तो लगा मुसीबत में हो । वो लड़के तंग कर रहे थे। इसलिए रुका मैं। आपको हेल्प नहीं चाहिए तो मुझे कोई शौक नहीं इतनी ठंड में यहाँ बैठने का।“
“अच्छा, तो लड़के तंग कर रहे थे मुझे? ये किसने बोला आपको। क्या मैं चीख रही थी, हेल्प हेल्प… मुझे बचाओ… नहीं न? ये भी तो हो सकता है मुझे अच्छा लग रहा हो। जिस नज़रों से वो मुझे देख रहे थे। आप तो शरीफ इंसान हो, पर हो सकता है वो मुझे साथ ले जाते, सारा मज़ा खराब कर दिया आपने तो। वैसे अभी थोड़ी देर पहले आपके चेहरे और आँखों में भी उन लड़को जैसे ही भूख दिखी मुझे।“
“ये क्या बकवास है। ऐसा कुछ नहीं… कुछ भी बोले चले जा रही हो। मैं लड़की होने का लिहाज़ कर रहा हूँ। और तुम।“
“क्यूँ कर रहे हो लिहाज़? क्या मैं इतनी बुरी हूँ, तुम्हारे लायक नहीं। क्या तुम्हारी बीवी मुझसे ज़्यादा सुंदर है। क्या वो सुपर हॉट है? ओह… तभी जल्दी है तुम्हें घर जाने की। मौसम भी तो इतना ठंडा है। घर जाकर गर्मी मिलेगी। हा… हा… हा…”
“ये लड़की तो सच में पागल है। मरे मेरी बला से, भाड़ में जाये, इसको ऐसे टाइम में मज़ाक सूझ रहा है। मैं चला जाऊंगा तब समझ आएगा। करती रहे हा हा हा यहाँ बैठकर…”
“ऐसे कैसे चले जाएँगे आप। जाना होता तो रुकते ही क्यूँ। वो भी दो बार।“
“पर मैंने तो कुछ कहा ही नहीं। ये भूत वूत तो नहीं कोई…” – इस बार ऑटो ड्राईवर पूरी तरह काँप गया, लगा वो जम गया है बैंच पर, पैर किसी ने बाँध दिये हैं ज़मीन से, और होठों को भी टेप से चिपका दिया है। मुँह खुल नहीं पा रहा और दिमाग की नसें फंटने ही वाली को हैं।
“अरे डरिए मत, एक लड़की ही तो हूँ, क्या ही बिगाड़ लेगी एक अकेली लड़की आपका।“
मतलब इसे सब कुछ पता है जो भी मैं सोच रहा हूँ मन में। वो लॉटरी वाली बात भी… ओह – “नहीं ऐसी कोई बात नहीं। मैं डरता वरता नहीं। वो बस… जैसी अजीब बातें कर रहे हो आप। और कुछ भी अनाप शनाप बोले जा रहे हो ……“
“अच्छा जी, अभी कुछ देर पहले ‘मैडम’ से ‘तुम’ हो गई थी मैं, अब फिर से ‘आप’ हो गई। ‘तुम’ ही कहो, आई डोंट माइंड। वैसे लॉटरी वाली बात सोचना गलत थोड़ी है। औरतें भी ऐसे ही सोचती हैं। आप जैसा मज़ेदार आदमी दिखे तो, हमारा मन भी तो मचल सकता है… क्यूँ? हा… हा… हा…” (कुछ देर उसकी हँसी गूँजती रही)
“अरे समझ गया मैं, आप वो हो यूट्यूब वाले, जो बकरा बनाते हो। पक्का कैमरा होगा आपके कोट के बटन में। और वो लड़के भी यहीं होंगे, सब मिले हुए हो।“ (खुद को संभालते हुए और बुरी तरह झेंपते हुए ऑटो ड्राईवर बोला)
“ओह तो अब आपको मेरी शक्ल से नीचे देखने का बहाना चाहिए, कोट का बटन चेक करना है या शर्ट का। या उसके बहाने कुछ और भी…” (अगर ये सब मज़ाक भी था तो लड़की अपने कैरक्टर को एक मंझे हुए एक्टर की तरह पकड़े हुए थी)
“ओ लड़की बस कर अब। बंद कर ये नाटक। मज़ाक की भी कोई हद होती है। इस फोन और यूट्यूब ने दिमाग खराब कर दिया है सबका। मेरी बेटी भी लगी रहती है सारा दिन। बीवी को भी चैन नहीं। कल रात को न नुकुर कर रही थी। दो थप्पड़ लगाए थे, और पूरी तसल्ली की थी मैंने, स्वाद आ गया था… आज सुबह उठ नहीं पा रही थी… बहुत मन की बातें समझ आ रही है न तो सुन, अब और ज़्यादा खेल खेला मेरे साथ… तो तुझे भी झाड़ियों के पीछे ले जाकर…” (उसकी वो नस दब गई थी, जो नहीं दबनी चाहिए थी, वो रूप बाहर आ गया , जिसे वो सबसे छुपाकर दिन भर ऑटो चलाता था, एक सीधा साधा दिखने वाला घरेलू आदमी)
अगले दो मिनट मानों एक घंटे जैसे हो गए, एक लंबी खामोशी दोनों के बीच से स्लो मोशन में गुज़री। दोनों चुप रहे, ऑटो वाले ने अपनी नज़रें ज़मीन में गड़ा ली।
पहली बार लड़की के चेहरे के हाव भाव बदले, पर वो डरी नहीं थी। बस हँसी गायब हुई थी। – “अच्छा अच्छा ठीक है, सोर्री , ये प्रैंक जैसा ही था, पर वो लड़के मेरे साथ नहीं थे। मैं एक माइंड रीडर हूँ.. मेंटलिस्ट भी बोलते हैं, मेरी गाड़ी सच में खराब हो गई, उधर गली में है, सोचा जब तक ठीक होती है, यहाँ बैठती हूँ, फिर वो लड़के आए, और आप भी आए मुझे बचाने…”
“हा… हा… हा… तो क्या प्रैंक तुम ही कर सकती हो, मेंने भी अभी वही किया।“ (अपने चेहरे से शर्मिंदगी को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए, नकली हँसी के साथ बोला)
“अच्छा ये प्रैंक था। मुझे लगा सच है। मेरी ही किस्मत खराब है, वरना मेरा भी मन तो हुआ था कि मुझे कसकर दो थप्पड़ लगें और झाड़ियों के पीछे ले जाएँ आप, और पूरी तसल्ली कर लें। मेरा पति बोरिंग इंसान है, मैं उसे न नुकुर करती हूँ तो वो मान जाता है। सोचा था आज कुछ नया एक्सपिरियन्स मिलेगा। पर आप भी बोरिंग ही निकले।“
इससे पहले कि ऑटो ड्राईवर कुछ समझ पाता अचानक एक गाड़ी सामने आकर रुकी, अंदर से मैकेनिक से दिखने वाले एक लड़के ने आवाज़ लगाई, “मैडम गाड़ी ठीक हो गयी है। आप चैक कर लीजिए’
“फालतू में ही शराफत दिखा दी, हाथ आया मौका गया” – ऑटो वाला मन ही मन बुदबुदाया।
बैंच से उठते हुए लड़की बोली – “हाँ मौका तो गया, वैसे ये मैकेनिक भी काफी स्ट्रॉंग और मस्त लग रहा है, गाड़ी के साथ इसको भी चैक कर लेती हूँ, शायद ये तुम्हारी तरह जीती हुई लॉटरी का टिकिट फाड़ कर न फेंके।“
लड़की लहराती हुई, गाड़ी की अगली सीट पर जाकर बैठ गई, और मैकेनिक से बोली – “मैं तो जम गई ठंड में, यहाँ बैठे बैठे, तुम ही ड्राइव करो… घर पास ही है मेरा, एक्सट्रा पैसे ले लेना।“
ऑटो ड्राईवर ठगा सा महसूस करता हुआ, बुत बन अपनी जगह खड़ा, गाड़ी को पीली रोशनी और कोहरे में गुम होता देखता रहा। रियर व्यू मिरर में लड़की ने ऑटो ड्राईवर को देखा और मुसकुराते हुए अपना चश्मा उतारा, आँख मारी और फिर से चश्मा पहन लिया।
(अगले दिन अखबार के दूसरे पन्ने की दो खबरें)
1. “पुलिस को मिली एक बड़ी सफलता, बीते दिनों हुए जघन्य बलात्कार और हत्याओं के मामले में ऑटो ड्राईवर गिरफ्तार। कुबुला अपना गुनाह। दरिंदा एक दस साल की बच्ची का बाप, जो रोज़ अपनी पत्नी को भी प्रताड़ित करता था। माना जा रहा है कि पत्नी ने तंग आकर खुद को और बच्ची को बचाने के लिए पुलिस को सूचना दी जिससे ये गुत्थी सुलझी”
2. “नहीं थम रहा हत्याओं का सिलसिला, कल रात एक मैकेनिक की लाश यमुना के किनारे झाड़ियों में बहुत बुरी हालत में, बिना कपड़ों के मिली। शंका जताई जा रही है कि हत्या से पहले उसका यौन शोषण हुआ, और उसे बेरहमी से प्रताड़ित किया गया। पुलिस को इसमें भी ऑटो ड्राईवर का हाथ होने का शक, पूछताछ जारी है। शहर में मची सनसनी, लोगों में रोष, अब लड़कियों के साथ लड़के भी सेफ नहीं। ये तो कलयुग का भी कलयुग आ गया है।“
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