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रिहाई.. खुद से!

रिहाई.. खुद से! Hindi Short Story by Gaurav Sinha A young girl and an elderly Indian lady sitting on a bench in park
Image generated by Grok AI

सुबह सुबह का वक़्त। हवा में कुछ हद तक ताज़गी। जो कुछ ही मिनटों बाद खो जाने वाली थी। हल्के शोर ने दिन को अपनी गिरफ्त में लेना शुरू किया ही था। पार्क में कुछ बुजुर्ग योगा के नाम पर शरीर के एक हिस्से को दूसरे से मिलवाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। कुछ जवानी से अधेड़ उम्र में दाखिल हो चुके, मगर दिल से जवान लोग, जॉगिंग करते हुए पार्क में वॉकिंग ट्रैक के होने को सार्थक कर रहे थे। और आखिर में थोड़े बहुत जागरूक पैरेंट्स अपने बच्चों को जल्दी जल्दी ताज़ा हवा की डोज़ दिलवा रहे थे। मानो डर हो कि फ़िर इतनी साफ हवा उन बच्चों को मिले न मिले। मिला जुलाकर सब सुबह को अपने अंदर समेट लेना चाहते हैं ताकि आने वाला बासी उबाऊ दिन उसी के सहारे गुज़ारा जा सके। देखने में सब ठीक ठाक, खुश लग रहे। कम से कम ऊपर से तो खुश, अंदर का हाल वही जानें।

पार्क के बीचों बीच एक बैंच, और उसपर दो लोगों के बैठने भर की जगह। आराम से चलते हुए एक लड़की जिसकी उम्र पच्चीस से तीस के बीच होगी, आकर उस बैंच पर बैठी। जब सही उम्र पूछने भर में हम हिचकिचाते हैं तो यहाँ पाँच साल का एज ब्रैकेट रखना ही सेफ रहेगा। उसने पाजामा और ढीली ढाली टी शर्ट पहनी है। माथे पर उलझे हुए बालों की एक दो लटें, शायद घर से निकलते वक़्त बाल बनाने की कोई कोशिश नहीं हुई। पैरों में घिसी हुई हवाई चप्पल, जिसका ब्रांड नेम चाहकर भी पता नहीं लगाया जा सकता। बालों की तरह उसकी चप्पलें भी उसकी बेपरवाही और बेबाकी की गवाही दे रहे। चेहरे पर एक अलग सा सुकून साफ-साफ चमक रहा है। उसकी आँखों में भी एक सच्चाई सी नज़र आ रही है। मानो अब खुद से या दुनियाँ से कोई पर्दा न करना हो- जो है सो है। कुछ देर तक वो वहीं बैठ कर सामने से आते जाते लोगों को देखती रही और अपने पीछे बड़े-बड़े पेड़ों से रुक-रुक कर चलती हवा से होने वाली सरसराहट महसूस करती रही। शायद लोगों से भरे इस पार्क में वही एक है जो सच में उस पल को जी रही है, पूरी तरह। उसे कहीं जाने की जल्दी नहीं, न किसी से मिलने की जल्दी, शायद पूरी तरह आज़ाद। पार्क में यहाँ वहाँ फुदकती चिड़ियाँ की तरह।

उसकी ये जागती आँखों की नींद तब टूटी जब बैंच पर एक और लड़की आकर बैठी। इस लड़की की उम्र पहली वाली लड़की से तकरीबन बीस साल ज़्यादा होगी। तो पचास से पचपन का ब्रैकेट रख लेते हैं। महिला भी कह सकते हैं, पर लड़की ही कहेंगे क्यूंकी इसके चेहरे पर भी एक सुकून, एक आज़ादी का भाव है। मगर शायद उससे भी बढ़कर कुछ है, एक शून्यता मगर साथ ही मन में अस्थिरता। इसने एक हल्के रंग का सूट पहना है। बाल अच्छे से खींच कर पीछे की तरफ करीने से बाँधे गए हैं। स्पोर्ट्स शूज पैरों के साइज़ से कुछ ज़्यादा बड़े लग रहे हैं। पर सभी स्पोर्ट्स शूज ऐसे ही तो दिखते हैं। शायद सही साइज़ ही हों। पर देखने में थोड़े अजीब तो हैं। अगले कुछ मिनटों तक दोनों चुप चाप उस बैंच पर अजनबियों की तरह बैठी रहीं। मगर बैंच चाहे पार्क का हो, रेलवे स्टेशन का, एयरपोर्ट का, बस स्टॉप का, या फिर हॉस्पिटल का। बैंच की खासियत यही है कि कुछ देर बाद ये अजनबियों को अजनबी नहीं रहने देता।

यहाँ भी यही हुआ। पहली पाजामे और टी शर्ट पहनी लड़की ने बातचीत की पहल की। वो कुछ अलग महसूस कर रही थी, मानों कोई भारी बोझ उतार फेंका हो। उसका मन अब उमस वाले बादल न होकर रुई से उड़ते बादल जैसा था – हल्का फुल्का और चमकदार। देखते ही देखते वो सारी कहानी कह गई। वो कहानी जो उसने अपने बहुत से दोस्तों और सगे संबधियों से भी नहीं कही थी अब तक। उसका हाल ही में डाइवोर्स हुआ था। शादी के एक ही साल बाद अलगाव वो भी जब शादी अपने मर्ज़ी से हुई हो। ये शायद जानकारों को बताना ज़्यादा मुश्किल था। मगर एक अजनबी से कहना आसान। उम्र में उससे कुछ बड़ी लड़की ने उसकी कहानी तसल्ली से सुनी। बिना किसी जजमेंट और उसे कुछ नहीं कहा। बस पूछा कैसा लग रहा है अब। तो पहली ने बताया – फ्री महसूस कर रही हूँ और खुश भी। और ये सुनकर दूसरी ने भी यकायक अपनी कहानी कहनी शुरू कर दी। अलगाव तो उसका भी हुआ था। मगर तरीका और वजह कुछ अलग थे। उसकी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह पर वो अपने पति से अलग हुई थी। दोनों में कोई दिक्कत नहीं थी, और न ही कोई अनबन।

पहली वाली लड़की के चेहरे पर खुद ब खुद तरस के भाव उमड़ आए। उसकी जागती आँखों वाली नींद इस बार पूरी तरह से टूट गई। लेकिन उसने भी बिना कोई सवाल किए चुपचाप सुनते रहना ही सही समझा। दूसरी लड़की ने बताया कि पाँच साल पहले उसके पति का एक्सिडेंट हुआ था। और वो चलने फ़िरने में असर्मथ हो गए थे। तो बीते पाँच सालों से वो अपने पति के साथ साये की तरह थी। धीरे-धीरे शरीर और मन दोनों कमजोर होते गए और आखिरकार उसके पति ने कुछ हफ्ते पहले – पच्चीसवीं सालगिरह वाले दिन ही हमेशा के लिए साथ छोड़ने का फैसला कर लिया। शायद वो अपनी पत्नी को आज़ाद देखना चाहते थे, खुद से रिहा कर देना चाहते थे। मजबूर नहीं मजबूत होकर फिर से जीते हुए देखना चाहते थे। तो अपनी व्हील चेयर को सीढ़ियों पर दौड़ाने की कोशिश कर, पाँच साल पहले हुए एक्सिडेंट को दोहराया। फर्क बस इतना था कि कार एक्सिडेंट में जान बच गई, इस बार मुक्ति मिल गई – शायद उनको भी और उनकी जीवन साथी को भी।

कहानी पूरी कर दोनों ने एक दूसरे से नंबर लिए। और इस नई नई मिली आज़ादी में कभी कोई दिक्कत आए तो फोन करने को कहा। बाकि ये पार्क और ये बैंच तो है ही। शायद ये औपचारिकता थी या शायद ये किरदार अच्छे दोस्त हो जाएँ। दोनों बैंच से उठे और अपने अपने रास्ते चल पड़े। एक तरफ हवाई चप्पल सीमेंट से बने वॉक-वे पर धूल उड़ाती हुई बेपरवाह जा रही है। इस बात से बेख़बर की पार्क में बाकि लोग क्या सोचेंगे। वहीं दूसरी तरफ स्पोर्ट्स शूज घाँस और नमी वाली मिट्टी को ज़मीन में दबाते हुई अपने निशान छोड़े जा रहे हैं। सहमें सहमे से कि कहीं कोई ये न कह दे कि घाँस को क्यूँ कुचल रहे हो। और हाँ, पहली लड़की ने स्पोर्ट्स शूज के बारे में पूछा था कि कुछ अजीब से नहीं हैं ये? तब दूसरी लड़की ने बताया कि वो स्पोर्ट्स शूज सच में 3 नंबर बड़े थे, इसलिए शायद उसे अजीब लग रहे हों। चाहकर भी इस अनचाही आज़ादी को पूरी तरह अपना नहीं पाई थी वो। किस्मत और समाज से रिहाई मिल भी जाये। सबसे मुश्किल होता है हमारा खुद को रिहा कर पाना।

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