
सुबह की अज़ान से नींद टूटी। बाहर जाकर देखा तो कबाड़ी वाला पुराने अख़बार, खाली बोतलें, प्लास्टिक और एक मुड़ा-तुड़ा, एक तरफ़ झुका हुआ तराज़ू लिए गुज़र रहा था। पड़ोस वाले दरवाज़े पर पहुँचकर वो रुका। उसे उम्मीद थी कि महीने भर के पुराने अख़बार मिलेंगे, हर बार की तरह। बंद दरवाज़े से ही आवाज़ आई – “भैया, हमने अख़बार बंद करवा दिया है।” कबाड़ी वाले ने कदम आगे बढ़ाए। मैंने आँखें मलते हुए हाथ लहरा दिया – “कॉम्पटिशन की किताबें भी किसी से माँगी हुई हैं। रद्दी का कोई स्कोप ही नहीं इस छोटे से कमरे में।”
ये रद्दी वाला भी सोचता होगा—अख़बार एक दिन बाद रद्दी हो जाता है, ये टीवी की खबरें कभी रद्दी क्यों नहीं होतीं? होतीं तो धंधा फिर से चल पड़ता। अच्छे दिन आ जाते उसके। कम से कम किसी के तो दिन फिरते। मकान मालिक अंकल ने सुबह के 7 बजे टीवी न्यूज़ फुल वॉल्यूम पर चला रखा था। कल ही डंडे पड़े प्रोटेस्ट में मुझे, मगर इनको देखो—लग रहा है मानो इंडिया ने ओलंपिक में पचास मेडल जीत लिए हों पहले ही दिन। शोर मचा रहे हैं, नेता जी ने विदेश जाकर दूसरे नेता को जोक सुनाया। हम पर पड़ी लाठियों की कोई क़ीमत ही नहीं, कम से कम नीचे स्टिकर पर ही चला देते।
सामने नाली का पानी सड़क पर छलकना शुरू हो गया है, जैसे नदी बाँध के ऊपर से बहना शुरू करती है। पास बैठा कुत्ता खुश है—गर्मी में उसको अब ठंडक मिलेगी। पहले लोग सप्लाई का पानी छींटते थे सड़क पर, अब पानी टैंकरों से आता है। आदमी नहाए, धोए या फिर सड़क पर छिड़के। ये सड़क के कुत्ते वैसे पहरेदारी अच्छी करते हैं रात को। नेपाली चौकीदार भी अब कम हो गए। सुनने में आया है नेपाल से अब दोस्ती पहले जैसी नहीं रही। ठीक भी है, जब देखो यहाँ के अपराधी नेपाल के रास्ते से भाग निकलते हैं, और तो और आजकल तो ये भी सुना है कि आतंकवादी भी टूरिस्ट बन बड़े मज़े से आते-जाते हैं नेपाल से।
तभी मकान मालकिन आंटी आईं और फ़ोन देते हुए बोलीं – “सूरज बेटा, ज़रा पढ़कर बताना ये मेरे मोंटी ने क्या भेजा है अमेरिका से। पाँच साल हो गए, बस बहाने बनाए जा रहा है। पता नहीं उसकी डिग्री पूरी हुई या नहीं, नौकरी लगी या नहीं। आज तक डिग्री की फोटो भी नहीं भेजी और न एक डॉलर ही भेजा। अंकल बता रहे थे अब तो डॉलर 90 रुपया हो गया, मतलब अच्छा ही है न। मगर पाँच साल में माँ-बाप की कोई सुनवाई नहीं। ऐसा कौन बेटा करता है? शुक्र है गीत की जॉब लग गई यहाँ, पर इसकी शादी भी तो करनी है… कब तक बेटी की कमाई खाएँगे।” हमेशा की तरह आंटी एक साँस में बोल गईं, जैसे इसके बाद उन्हें बोलने के लिए टैक्स देना पड़ेगा। बोलना ना हुआ, बैंक में मिनिमम बैलेंस हुआ—अपनी ही चीज़ इस्तेमाल करने पर जुर्माना। अरे, मिनिमम बैलेंस वाली बात से ज़्यादा यूपीआई वाला लॉजिक फिट बैठता है। खैर, लॉजिक और फ़ैक्ट्स की किसे पड़ी है।
मोंटी ट्रक चलाता है अमेरिका में, और इनको झूठ बोला हुआ है कि बढ़िया जॉब लग गई है। इनको उम्मीद है कि इनकी मदद करेगा। पर सुना है वहाँ थोड़ी सख़्ती है अब। पता नहीं हर देश को हमारी तरक़्क़ी से कितनी चिढ़ है। मैसेज में इन्हीं से पैसे माँगे हैं जितना जल्दी हो सके। पढ़कर मैंने बताया – “अरे आंटी, सब बढ़िया है। नौकरी मिल तो गई उसे, प्रमोशन भी हुआ है। बोल रहा है यहाँ रोक-टोक है इसलिए पैसे नहीं भेज पा रहा। जल्दी भेजेगा, आप लोग चिंता न करें।” चलो किसी तरह संभाला ये मामला, नहीं तो आंटी ने किराया माँग लिया होता फिर से।
अरे ये क्या, आज लंगर लगा है गली में, मतलब खाने का इंतज़ाम हो गया। कुछ एक्स्ट्रा पुड़ियाँ लेकर मैं वापस अपने कमरे में। लोग फ़ालतू में रील्स देखते हैं, मैं तो खिड़की से ही एंटरटेनमेंट कर लेता हूँ। नीचे नाली का पानी सड़क के बीच तक आ गया है। लोग बच-बचकर निकल रहे हैं, मानो बाढ़ से बाँध टूट गया हो। शुक्र है बारिश कम हुई इस बार शहर में, वरना सच में बाढ़ आ जाती।
फ़ोन की घंटी बजी – “बेटा सिराज, तू ठीक है न? सुना पेपर फिर से लीक हुए। ख़बरदार जो प्रोटेस्ट में गया। माहौल वैसे ही खराब है। पैसों की चिंता मत कर, अब्बा भिजवा देंगे अगले हफ़्ते तक। हम लोग गीता कॉलोनी वाला घर बेचकर सब्ज़ी बाग जा रहे, तुम्हारे फूफी के बगल वाले मकान में। पैसे अच्छे मिल रहे हैं। शुक्र है शहर में ये सब चीज़ें नहीं हैं। कितने अच्छे मकान मालिक हैं तेरे… बस तू अच्छे से पढ़ाई कर। नमाज़ अदा कर लिया कर टाइम से। उसमें कोई आलस नहीं।”
“ठीक है माँ, बहुत पढ़ाई करनी है। बाद में बात करता हूँ, आवाज़ भी ठीक से नहीं आ रही, नेटवर्क वीक है यहाँ।” माँ किसी की भी हो, सबको एक साँस में बात पूरी करनी होती है। अरे वही यूपीआई वाला लॉजिक…
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Samaj ka wo aaina jise dekh har koi rha bas andhbhakti ki ankho me patti hai jisse sab dekh kar bhi bas utna hi dikhayi deta jitna ap dekhna chaho…aur waisa hi dikhayi deta jaise rang ki patti hai ankho me ……
Kitni ajeeb baat hai ki ek khidki kitni zindagiyo ki kahaani bata deti hai. Floods, estrangement from family, financial struggles and the thoughts of the protagonist- in sabko bind karta hua ek khoobsurat kahaani hai ye. Covering beautifully so many aspects of aam admi.