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नीली साइकिल… और सड़ते हुए फ़ल!

नीली साइकिल... और सड़ते हुए फ़ल! A thought provoking short story by Gaurav Sinha, Hindi Satire on Indian Society, lack of empathy and hypocrisy.
Image generated via an AI, story woven by a human 

सुबह सुबह आँख मलते हुए जब बालकनी से झाँका।
तो हर रोज़ की तरह कोने में दीवार पे झुकी हुई वही पुरानी नीली साइकल दिखी।
आज उस पर धूल थोड़ी और बढ़ गई थी, जिससे उस पर लगी ज़ंग वाला मरून रंग ढक गया था।

ये वही साइकल है जिसकी घंटी सुनकर कभी सुबह हुआ करती थी।

बिल्डिंग का केयर टेकर / गार्ड / सर्वेसर्वा / जिसे हम मज़ाक में अपार्टमेंट का मालिक भी कहा करते थे। ये उसी की साइकिल थी, या शायद उसे किसी ने दी थी।

पता नहीं, पर लगभग पिछले 15-20 सालों से यहीं काम कर रहे थे। अब तो परिवार भी साथ था, जिसमें दो बच्चे भी थे—नाती और नातिन। दोनों बच्चे पास के स्कूल जाते थे, ताकि पढ़-लिख लें और आगे की ज़िंदगी अपने नाना जैसी न हो।

उनके लिए भी पूरी बिल्डिंग एक घर की तरह थी।
वो एक तरह से मुफ्त में गार्ड के बैकअप का काम करते थे, सब जान गए थे।

कब पानी का मोटर चलाना है,
कब और कैसे जनरेटर चलेगा,
यहाँ तक कि पार्किंग का हिसाब-किताब भी।

उनकी वजह से चहल-पहल रहती थी।

ये बच्चे कोविड के बाद गाँव से आए थे। उससे पहले सिर्फ गार्ड जी। अकेले रहते थे,
“जी” उनको इज़्ज़त देने के लिए इस्तेमाल होता था। अच्छा माहौल था।


कोविड के वक़्त जब सब घरों में बंद थे, तब गार्ड जी मुंह पर कपड़ा बांध। किसी मंझे हुए हैल्थ वर्कर की तरह, सबके घरों में जरूरी सामान पहुंचाते। मुझे लगता था, अगर ये सोसाइटी—अगर हम इसे सोसाइटी कह सकें। अपार्टमेंट या बिल्डिंग कहना ही ठीक होगा।

जिसमें लोग एक दूसरे को नहीं जानते। अगर वो चल रही है तो, उन्ही गार्ड जी की वजह से।


कुछ वक़्त पहले, बिल्डिंग का रिपेयर शुरू हुआ, लगभग छह महीने लग गए।

पेंटिंग, लिफ्ट बदलना, पानी की टंकी की सफाई, बरसात में पानी से पार्किंग लबालब न हो इसलिए सिवेज सिस्टम की मरम्मत वगैरह वगैरह।

गार्ड जी ने मन लगाकर सब कुछ करवाया। उन्हे उम्मीद थी की इस बार शायद सैलरी भी बढ़ जाए। वादा भी हुआ था। पर जब वक़्त आया। उन्हे पुरानी सैलरी थमा दी गई।

वो भड़के – “आज के समय में नौ हज़ार में कैसे गुज़रा हो।“

जवाब में बिलकुल कॉर्पोरेट मैनेजमेंट सिस्टम की तरह कहा गया –
“आप यहाँ से अपनी फैमिली को हटाएँ। बढ़ा देंगे।
पंखा एक्सट्रा चलता है, पार्किंग स्पेस भी जाता है।”


वही गार्ड जी जो कल तक हर किसी के मोबाइल के स्पीड डायल पर थे।
आज बिल्डिंग के नेताओं के लिए विलेन थे।

खैर, खुद्दार आदमी को लगा बाकी के लोग समझेंगे। पर व्हात्सप्प ग्रुप में समझा दिया गया। की खुद ही जा रहे अपने मर्ज़ी से। सैलरी न बढ़ाने की बात छुपा ली गई।

जैसे अख़बार की बड़ी बड़ी हैड्लाइन्स में छोटी मोटी, मामूली पर असल खबरें गायब कर दी जाती हैं।


गुपचुप तरीके से बिल्डिंग के मालिक की विदाई हुई। टर्मिनेशन को रेसिग्नेशन कहकर।

अब वो गार्ड नहीं है। अनपढ़ है, पर मेहनती आदमी है,
कहीं न कहीं गुज़र कर रहा होगा। बच्चों को पढ़ाना भी है।


अब नया गार्ड जो पहले वाले से उम्र में बड़ा ही होगा, चुप चाप नज़र आता है। सुना है तंख्वाह पहले वाले से तीन हज़ार ज्यादा पाता है। धीरे धीरे शायद वो भी गार्ड से, गार्ड जी बन जाये।

यहाँ भी वही वाहियात कॉर्पोरेट लॉजिक –
नए काम न जानने वाले को ज़्यादा पैकेज में लाना मंजूर
पर पुराने लोयल कर्मचारी को हक के पैसे दें, मतलब ही नहीं बनता।


वो नीली साइकिल शायद किसी ने दी ही होगी गार्ड जी को,
तभी जाते जाते छोड़ गए, अपनी निशानी के तौर पर।


सोचने वाली कुछ बातें

  • हम में इंसानियत है, या कॉर्पोरेट कल्चर?
  • या पॉलिटिक्स परिलियामेंट से हर जगह घुस गई है, जहां सब कुछ जायज़ है?
  • सब कुछ transactional यानी लेन-देन?
  • नकली “जी’ वाला रेस्पेक्ट ?
  • सामने होते हुए, अन्याय पर चुप रहना।

समाज धीरे-धीरे ही सड़ता है, फल और सब्जियों की तरह।
और एक सड़ा हुआ फल पूरी टोकरी के सड़ने की स्पीड तेज़ कर देता है।

पर क्या करें, अब अधिकतर इंसान भी उन अच्छे फलों की तरह हो गए हैं।
जो बेचारे अपनी जगह पड़े पड़े, खुद को सड़ता हुआ देखते रहते हैं।

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