
“आज मन नहीं लग रहा, क्या किया जाए? मिसेज़ शर्मा भी इंडिया में नहीं हैं, नहीं तो रोटरी क्लब ही चली जाती उनके साथ… ये नेटफ्लिक्स भी डाउन-मार्केट हो गया है। Now we have to watch bloody Saas-Bahu on Netflix, pathetic…”
सुरभि अपने नए किंग-साइज़ बेड पर लेटे-लेटे दुनिया की सबसे बड़ी प्रॉब्लम्स को मन में सुलझाने की कोशिश कर रही थी।
“मेमसाब, आज शाम के खाने में क्या बनेगा?” – सुनीता ने रोज़ की तरह पूछा। सुरभि के मन के ओटीटी में चल रहे मोनोलॉग पर जैसे किसी ने रिमोट से पॉज़ बटन दबा दिया।
सुरभि की अभी हाल ही में शादी हुई थी। पति एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस में थे। शहर में धाक थी – बड़े कारोबारी, नेता, अफसर, हर किसी से अच्छी जान-पहचान। ज़्यादातर समय पार्टी, फ़ंक्शन और क्लब्स में ही गुजरता था। बड़ा सरकारी बंगला, उसमें रहने वाले दो लोग और दस लोग उनकी सेवा में हाज़िर। यानी सरकारी नौकर के नौकर… सॉरी, हाउस-हेल्प्स कहना ज़्यादा ठीक रहेगा। नौकर, बाई – ये सब आज के प्रोग्रेसिव ज़माने में अच्छा नहीं लगता।
सुरभि ने सुनीता से कहा – “चाइनीज़ ही बनाओ आज, साहब को पसंद है। और लास्ट टाइम की तरह मंचूरियन ज़्यादा spicy मत बनाना। और ऑयल भी कम यूज़ किया करो। हम लोग आजकल health chart फॉलो कर रहे हैं।”
सुनीता उनके ड्राइवर की पत्नी थी और तीन बच्चों समेत सारा परिवार servant quarters में रहता था, बंगले में ही। बंगला क्या – एक अलग दुनिया थी। बड़ा-सा बगीचा, जिसमें सुबह मोर और कभी-कभार विदेशी पंछी भी पलायन करके आ जाते। घर के पीछे इतनी जगह कि साग-सब्ज़ियों के लिए मार्केट न जाना पड़े। और सबसे अच्छी बात – सब कुछ संभालने के लिए लोग। फिर चाहे माली हो, सिक्योरिटी गार्ड्स हों, ड्राइवर हो, या खाने पकाने के लिए सुनीता। सफ़ाई के लिए भी दो-चार लोग थे, जो बदलते रहते, तो नाम याद भी न रहते।
पति के ऑफिस जाते ही सुरभि के लिए ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो जाती थी। इतने बड़े आलीशान घर को संभालना कोई मज़ाक थोड़ी है!
सुनीता के किचन में जाने के बाद सुरभि ने टीवी का रिमोट उठाकर फिर से search mode ऑन किया। “White Swan” – एक इंग्लिश फ़िल्म पर जाकर रिमोट को राहत मिली। उसके बटन अब शायद कुछ समय आराम कर पाएंगे। रिमोट, जो गुस्से और परेशानी में गरम हो रहा था, अब एसी की ठंडी हवा में अपना मानसिक संतुलन वापस पा रहा था।
“पिछली पार्टी में सभी इसी फिल्म के बारे में डिस्कस कर रहे थे। काश मैंने पहले ही देख ली होती। मुझे इंग्लिश फ़िल्म समझ नहीं आती, शुक्र है आजकल हिन्दी में बस एक बटन दबाकर देख सकते हैं। नहीं तो सबटाइटल तो हैं ही… पर नहीं! इंग्लिश में ही देखूंगी। कैसे डायलॉग बता रहे थे सब! मुझे भी पता होने चाहिए।”
सुरभि के मन में “बटन दबाने” की बात सुनकर रिमोट घबरा गया, पर खैर, बाल-बाल बचा। भला हो उन kitty और क्लब पार्टियों का।
कुछ देर मूवी देखने की कोशिश की, पर इंग्लिश डायलॉग आधे समझ आते, आधे ऊपर से निकल जाते। सबटाइटल पढ़ते-पढ़ते अगला सीन आ जाता। आधे घंटे की मेहनत के बाद सुरभि ने वापस अपने सुख दुख के साथी – यानी स्मार्टफोन – की ओर रुख किया।
अभी-अभी लॉन्च हुआ फोन, किसी के पास नहीं, बस उसी के पास। इतनी अच्छी फोटो आती थी इसमें। सुरभि ने फटाफट सबके status देखे। मिसेज़ शर्मा ने यूरोप की ढेर सारी फोटो डाली थीं। सुरभि ने फटाफट लाइक कर दीं – “उनको ये न लगे कि मैं उनसे चिढ़ती हूँ। मैं क्यों चिढ़ूँ? मेरे पास कमी ही क्या है। उल्टा सभी मुझसे jealous रहते हैं। किसी के पास है इतना शानदार बंगला? मिसेज़ सिंह ने कैसे मुँह बनाकर तारीफ़ की थी पिछली बार जब आई थीं डिनर पर। साफ दिख रहा था कि नज़र लगा रही हैं हमारे बंगले को। खुद एक 3 BHK फ्लैट में रहना पड़ता है। फ्लैट और बंगले में भला क्या मुकाबला! पिछली बार kitty पार्टी तो हमारे गार्डन में ही हुई थी। जब एक हिरण और नीलगाय दिख गए थे बाउंड्री के बाहर, तो सब “ओह माय गॉड, ओह माय गॉड” करके वीडियो बनाने लगे थे।”
वीडियो और फोटो तो सुरभि ने भी डाले थे सोशल मीडिया पर, पर मिसेज़ सिंह और मिसेज़ शर्मा सारा क्रेडिट ले गईं। अपने एनजीओ वाले इवेंट से। बस कुछ कपड़े और खाना दे आए थे बस्ती में, और उनके साथ फोटो-वीडियो एक हफ़्ते तक पोस्ट करते रहे।
तभी फोन पर लेटेस्ट सॉन्ग की रिंगटोन बजी। सुरभि ने जान-बूझकर कुछ देर तक बजने दिया। फिर उठाकर बोली –
“सॉरी प्रिया, थोड़ी बिज़ी थी। किचन में… तुम्हें तो पता है, ये सुनीता अपने बच्चों में ही लगी रहती है और हर बार गड़बड़ कर देती है। तो मुझे देखना पड़ता है। कहने को दस-दस नौकर… मेरा मतलब house help हैं। मगर तुम तो जानती हो। अच्छा हुआ तुमने कॉल किया। मैं सोच रही थी इस वीकेंड हम दोनों गरीबों की कुछ मदद कर आएं। बाढ़ का पानी अब कम हो गया है, तो वहाँ जाना सेफ़ है। हाँ-हाँ, कोई show off नहीं, मिसेज़ शर्मा और सिंह की तरह। अलग से कैमरामैन लेकर गए थे, हद ही है! नहीं-नहीं, हम बिलकुल वो सब नहीं करेंगे। बस थोड़ा राशन और कपड़े देंगे। लोगों की दुआएं मिलेंगी।”
एक हफ़्ते बाद, सुरभि अपनी बालकनी में फोन पर अपने पोस्ट के कमेंट देखकर खुश हो रही थी। कितनी अच्छी पिक्चर आई थी उसके नए फोन में। सिर्फ़ चार-पाँच ही फोटो थीं, पर सब कितने अच्छे लग रहे थे।
मिसेज़ शर्मा ने यूरोप से कमेंट किया –
“ओह माय गॉड सुरभि, You have done a great job! So proud of you. We need more youngsters like you.”
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Prompt given by Kisu through collage below: Get a taste of his storytelling here

Oh my God Gaurav you have done a great job! I am so proud of you। We need more youngsters like you! Maza aa gaya padhne me. I was laughing throughout. More so, my head was reading it in your voice amazing
Gud story, yet feels incomplete in end.
U may extend further.
One comment , fifth paragraph, aaj sahab ko pasand hi.
Aaj must be removed.
Lovely one, very interesting. Part which I liked the most is personification of remote .
This story very well portrays loneliness in the life of today’s generation even after being surrounded by N no. of people.