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मालदा आम | King of Mangoes

मालदा आम | Horror Story Hindi | Psychological Horror | Gaurav Sinha |
Image generated via an AI, story woven by a human 

ये है क्या ? कुछ तो अजीब है… मुझे यहाँ आना ही नहीं चाहिए था।

और करो सोलो ट्रैवल, बनो ट्रैवल इन्फ़्लुएन्सर… ये अंग्रेजों के टाइम का गेस्ट हाउस है, और दूर-दूर तक कुछ और नहीं। स्टाफ के नाम पर दो लोग, वो भी शाम होते ही, जाने कहाँ गायब हो जाते हैं।

खिड़की से दोबारा बाहर देखने की कोशिश की, ठंड के कारण कुछ साफ नहीं दिख रहा था। मगर जितना भी दिख रहा था, वो नॉर्मल तो नहीं था। यूँ तो उसे आसानी से डर नहीं लगता था। मगर आप कितना भी ख़ुद को बहादुर समझो। जब आपको अपनी आँख ऐसा कुछ दिखाये जो आपने कभी सोचा तक न हो, तब लॉजिक और साईंटिफ़िक टेम्पेरामेंट भी थोड़ी देर के लिए गायब … यानि टेम्पोरेरीली स्नूज मोड़ में चले जाते हैं।

रात का अँधेरा, माइनस दो डिग्री वाली ठंड, खिड़की का कोहरे वाला शीशा, उसके ऊपर आपके चश्मे का शीशा, और उसके पीछे आपकी अधखुली आँखें। इस बार पूरा ध्यान लगाया। बाहर टिन के शैड पर कुछ चमक रहा था। रंग समझ में नहीं आ रहा था। पर वो हिल रहा था, हिल क्या रहा था….. ये ठीक वैसा ही था जैसे छोटा बच्चा पालने में झूलता है। क्या सच में किसी ने बच्चे को ठंड में मरने को छोड़ दिया है? नहीं, ये वहम ही होगा।

जैसे बर्फबारी हुई है, पता नहीं कब रास्ता साफ होगा और यहाँ से जाने का मौका मिलेगा। दोबारा सोने की नाकाम कोशिश शुरू हुई। चश्मा उतारकर साइड में रखा और कांपते हुए रज़ाई के अंदर। पर मन का क्या करें, उस पर कौन सा पर्दा डाला जाए। वो अभी भी खिड़की के बाहर ही अटका था।

ठक… ठक… ठक… दरवाज़े पर दस्तक हुई। पहले लगा सपना है, फिर दोबारा वही दस्तक – ठक… ठक… ठक… ठीक तीन बार। ये ज़्यादा हो रहा है अब, बिना मतलब डरना बेकार है। दिमाग को झकझोरा… मन को भी थोड़ी फटकार लगाई। शायद स्टाफ हो, कुछ बताने आया हो।

दरवाज़ा खोलने से पहले, एक बार फ़िर खिड़की से झाँका। टिन का शैड खाली। दोबारा देखा… सच में कुछ नहीं था वहाँ। हाथों से शुरू होकर, माथे से होते हुए, सिर तक एक तेज़ सिरहन दौड़ गई।

शायद यही बताने स्टाफ आया हो। उन्होने उसको हटा दिया है। शायद किसी जानवर का बच्चा या कोई चिड़िया का घोंसला उड़कर गिरा था। दरवाजे पर कोई है भी, या नहीं… दिमाग समझा ही रहा था कि…

ठक… ठक… ठक …. ठीक तीन बार… तीसरी बार।

खिड़की से दरवाज़े तक मुश्किल से सात क़दम की दूरी थी। पर पहुँचने में साठ सेकंड लगे होंगे। माथे पर हाथ पड़ा तो, ठंडे पसीने की बूंद… जो अब हाथ की उँगली पर उतरकर गरम हो गई थी।  

की-होल था नहीं, दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं, दरवाज़ा जितनी धीरे खोला था, उससे दस गुना तेज़ी से बंद किया। अपनी ही धड़कने कानों में गूंज रही थीं। कुछ था तो बाहर… वही, जो खिड़की के बाहर था। हाँ, वही तो था दरवाजे के सामने। आँखों ने ना देखते हुए भी नीचे देखा था। पर था क्या? वो साफ नहीं था।

आज समझ आया वो हॉरर फिल्मों में क्यूँ लोग बेवकूफी करते हैं। तीन बज रहे हैं, बस दो घंटे और, सुबह हो जाएगी, स्टाफ आएगा, और सब ठीक। हो सकता हो, वहम हो, सपना हो, या फ़िर सच भी है। तो… क्यूँ पंगे लें और बेवकूफी करें।

पर, इंसान अगर बेवकूफी न करे तो उसकी लाइफ का क्या मतलब। डरते डरते, नकली हिम्मत दिखाते हुए, दरवाजा फ़िर से खोला। नीचे एक मखमली कपड़े में कुछ लिपटा था। उठाया और अंदर लाकर टेबल पर रखा।

हल्के हरे रंग का, बड़ा सा आम, हाँ आम…एक छोटी टोकरी में, मखमली चमकदार कपड़े में लिपटा हुआ।

ये क्या मज़ाक चल रहा है? मतलब, आम था खिड़की के बाहर, कोई जानवर, चिड़िया या इंसान का बच्चा नहीं? पर उसने हिलते देखा था, पालने की तरह। गौर से देखा टोकरी का शेप भी बिलकुल पालने जैसा था।

ये पक्का कोई प्रैंक है। वरना हिमाचल के इस छोटे से गाँव में, इस मौसम में, ये आम? शायद नकली है?

फ़िर से नकली हिम्मत करते हुए, हाथ आगे बढ़ाया और आम हाथ में, बड़ी मुश्किल से काँपती हुई हथेली में फिट हुआ। हथेली नाक के पास और आम नाक के बिल्कुल पास। मीठी महक, नकली नहीं है। जानी-पहचानी महक है। ये तो वही आम है, जो बंगाल में खाया था। पिछली गर्मियों में… क्या नाम था। मालदाह, मालदा, हाँ, पक्का वही।

आम की महक में, दिमाग बहक और भटक गया था, और मन भी। कुछ देर के लिए डर भी गायब। दो घंटे और, बस दो घंटे और… सब साफ हो जाएगा।

हथेली फ़िर से टोकरी की तरफ, आम को आराम से संभाल कर कपड़े में लपेट कर रखा। मानो कोई छोटा सा दूध पीता बच्चा हो। गहरी साँस लेकर वापस बिस्तर… रज़ाई और सोने की कोशिश। नींद न भी आए, सर्दी से तो बचना था। रज़ाई में ही फोन की स्क्रीन में टाइम देखा, तीन बजकर बीस मिनट। बैटरी लेवल सत्तर परसेंट। शुक्र है, नया फोन है।

फोन में सर्च किया, मालदा आम – AI Summary – “ मालदा आम (विशेषकर दीघा मालदा) बिहार और पश्चिम बंगाल का एक प्रीमियम, रेशा-रहित और अत्यंत मीठा आम है, जो अपनी पतली गुठली और भरपूर गूदे के लिए प्रसिद्ध है। इसे बिहार में ‘आमों का राजा’ भी कहा जाता है, जो मुख्य रूप से सफेद-हरे रंग का होता है।

है तो यही वाला आम। पर यहाँ कैसे आया, इतना फ्रेश? आजकल हर मौसम में कोई भी फल मिल जाता है।

पर बाहर कैसे था, फ़िर दरवाजे पर कौन रख गया? शायद कोई गिफ्ट दे रहा होगा, या कोई डराने के लिए मज़ाक…

पर आम ठंडा नहीं था, गरम था…. जैसे अभी-अभी किसी ने पेड़ से ज़िंदा तोड़ा हो।

मोबाइल स्क्रीन पर मालदा आम की अलग-अलग तस्वीरें, बैटरी लेवल उनहत्तर परसेंट। टाइम तीन बजकर उन्नतीस मिनट। इस बार दो आवाज़ें एक साथ – ठक… ठक… ठक, ठीक तीन बार और मेज़ पर कुछ सरकने की आवाज़, बिल्कुल साफ। ये वहम नहीं है। बिलकुल नहीं…

एक बार फ़िर से, नकली हिम्मत और असली बेवकूफी। शरीर रज़ाई से बाहर… और टेबल पर जो दिखा उसको देखकर दिमाग की नसें माथे से बाहर… आम से भरी टोकरी हिल रही है, जैसी कोई पालना झूला रहा हो… और मालदा आम मुस्कुरा रहा है, उसे देखकर। आम, आम नहीं सच में बच्चा है?

पता नहीं कब और कैसे, दौड़कर दरवाज़ा खोला। बाहर एक बाबा सा दिखने वाला कोई, माथे पर बड़ा सा टीका लगाए हुए, अजीब तेज़ चमकता हुआ चेहरा । लगभग गूँजती हुई आवाज़ – “मैं कल ही बाबा बैद्यनाथ धाम से होकर आया हूँ, ये लो प्रसाद।“

घबराकर दरवाज़ा बंद किया, पलटकर देखा आम भी पलट गया है, अब मेज़ पर है, पर हिल रहा है, बच्चे की तरह। टोकरी अब भी झूला बनी हुई है। दोनों बिना किसी बैकग्राउंड म्यूजिक के झूम रहे हैं अलग-अलग, पर एक साथ।

दो दिन बाद, मौसम साफ, चुभने वाली पहाड़ी धूप। अपना बैकपैक पीठ पर लटकाया। गेस्ट हाउस के स्टाफ को पाँच सो रुपये पकड़ाये, तेज़ बुखार में ख़्याल रखा था दोनों ने।

बस स्टैंड पर इक्का दुक्का लोग, स्टेट रोडवेज की बस रुकी। ड्राइवर के पीछे, मगर बाकी सबके… सबसे आगे की सीट। बैकपैक से पानी की बोतल निकालते वक़्त, मखमली कपड़ा भी गलती से निकल गया, या शायद जानबूझकर। और उसके अंदर मुस्कुराता हुआ हरा-सफेद, हल्का पीला, खुशबूदार मालदा आम।

पर अब माथे पर कोई पसीना नहीं, कोई डर नहीं। हल्की सी, अजीब सी मुस्कान।

कंडक्टर ने पूछा, कहाँ की टिकट?

मुँह से निकला – “बाबा बैद्यनाथ धाम”

क्या? कहाँ की टिकट?

मन ही मन बुदबुदाहट – “…बाबा धाम… झूला, बच्चा, मालदा आम…”

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