
हम जो कुछ देख सुन बड़े होते हैं उसी से हमारा व्यक्तित्व तय होता है। उस हिसाब से सोचिए हमने अपने युवाओं के साथ कितना बड़ा धोखा किया है। जो बच्चे अभी वोट देने की उम्र के हुए हैं उन्होंने जब से होश संभाला उनके लिए नफ़रत नॉर्मल है। प्रेम भाईचारा अपवाद, और अजीब भी।
वो मॉब लांचिंग, सरकारी लापरवाही से लोगों की मौत पर बेशर्मी से हँसते नेता, जीरो अकाउंटेबिली, लीगलाइज्ड करप्शन, क्रिमिनल्स को फूल माला पहने, पीड़ितों का पुलिस द्वारा पीटा जाना, एनिमल, कश्मीर फाइल्स, धुरंधर जैसी जाने कितनी नफरती प्रोपेगेंडा फिल्में देखते हुए बड़े हुए हैं।
हाल ये है कि अगर कोई एंटी वार फिल्म आ जाए, या कोई “शांति” लिख भर दे तो उसे प्रोपेगेंडा करार दिया जाता है। हाल ही में धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म “इक्कीस” को लोग सिर्फ इसलिए बकवास कह रहे क्योंकि उसमें अमन की बात की गई है। सैनिकों को इंसान दिखाया गया। फिल्में सॉफ्ट पावर यूँ ही नहीं कहलाती। उनका गहरा असर होता है। आज के दौर के लोगों को “रंग दे बसंती” या “स्वदेस” हजम होती? रिलीज़ हो जाती, वो भी गनीमत।
फिल्मों को समाज का आईना बताया जाता है। और ठीक भी है। पर आज के दौर में उल्टा है। ऐसा दिखाया जा रहा है। जिससे धीरे धीरे जो कुछ ग़लत है वो नॉर्मल लगने लगे। वही सच लगने लगे। सत्तर के दशक की गुलज़ार की “मेरे अपने” देखिए उस वक्त जो गुस्सा था युवाओं में नज़र आएगा। “रंग दे बसंती” में भी वही सब था। खुलकर तब की सरकारों के ख़िलाफ़ थीं। पर खूब सराही गईं। जिन्होंने नहीं देखी, देखिए।
कोई भी फिल्म या कहानी आपको अंत में क्या फील करवाती है, उससे उसकी नीयत का पता चलता है। क्या वो आपको बेहतर इंसान बनने, बेहतर समाज बनाने, कुछ अच्छा करने को प्रेरित करती है। इतना कुछ न भी हो कम से कम “फील गुड” करवाती है, उम्मीद देती है। या सिर्फ़ और सिर्फ़ नफ़रत, गुस्सा, अपने ही देश के लोगों के प्रति शक पैदा करती है।
सीवर का पानी पीकर लोग मर रहे। सोशल साइंटिस्ट जेल में हैं। नोबेल विजेता से उसके नागरिक होने का प्रमाण मांगा जा रहा। दिल्ली समेत कई शहरों में साँस लेना जानलेवा हो चुका। एक मेडिकल कॉलेज के बंद होने पर खुशियाँ मनाई जा रही। क्योंकि कुछ मुस्लिम बच्चे डॉक्टर बन जाते। वो भी उस देश में जहाँ लोग सर्द रातों में दिल्ली के एम्स के बाहर रात गुजार रहे क्योंकि, बाकी शहरों में अच्छे अस्पतालों और डॉक्टरों की कमी है।
आज ये सब नॉर्मल है। क्या ये रातों रात हुआ? नहीं, हम सबने अपनी आँखों के सामने होते देखा, देख रहे हैं, किसी न किसी तरह भागीदार रहे हैं। फहमीदा रियाज़ जी की नज़्म “तुम बिलकुल हम जैसे निकले” साल दर साल “पॉल द ऑक्टोपस” की भविष्यवाणी की तरह मज़बूत होती जा रही है। पागलपन अब नॉर्मल है, और नॉर्मल सोच रखना पागलपन!
गौरव सिन्हा
९ जनवरी २०२६
The Blog Post from June 2022 was written pre-AI Boom, and now it’s almost impossible to differentiate between real and fake news. Hence, we need to be extremely careful while sharing any forwards.
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