
- समीरा अब तक कोमा में है?
- समीरा अब तक कोमा में है?
- हूँ… हाँ… क… क्या कहा तुमने?
- समीर, हिम्मत रखो। इतनी बड़ी लड़ाई लड़ी है तुम दोनों ने, थोड़ी हिम्मत और…
हाँ… कुछ संभलते हुए समीर ने फोन पर दबी-सी आवाज़ में हामी भरी।
समीरा के एक्सीडेंट को चार महीने हो चुके थे। समीर हॉस्पिटल के वेटिंग एरिया को ही अपना घर बना चुका था। रोज़ की तरह डॉक्टर से पूछा—
“मेरी बच्ची कब होश में आएगी?”
डॉक्टर का भी हमेशा की तरह वही जवाब—
“हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं, समीर। पर Neuro (दिमागी चोट) के केस में कुछ भी पक्का नहीं कहा जा सकता। भरोसा रखो, she is a strong girl, she will bounce back.”
डॉक्टर ने अटेंडेंट को इशारा किया।
अटेंडेंट समीर को बच्चों-सा सहारा देकर कैंटीन में ले गया।
हॉस्पिटल की कैंटीन भी अजीब जगह होती है। एक तरफ लोग ज़िंदगी से जूझ रहे होते हैं और दूसरी तरफ उनकी देखभाल कर रहे लोग। न चाहते हुए भी मन मारकर जी रहे होते हैं, क्योंकि ज़िंदा रहना ज़रूरी है। समीर तो मानो भूल ही गया था कि हॉस्पिटल के बाहर भी कोई दुनिया है।
डॉक्टर ने अटेंडेंट किशोर को समझा दिया था कि चाहे पेशेंट समीरा है, पर वह समीर का ख़याल भी एक मरीज़ की तरह ही रखे और उसके खाने-पीने का पूरा ध्यान रखे।
चाय और सैंडविच लिए किशोर समीर की टेबल पर आकर बैठ गया।
“सर, आप कभी कुछ नहीं बोलते। क्या हमसे बात नहीं करना चाहते? हम पढ़े-लिखे कम हैं, शायद इसलिए? ख़ैर, कोई बात नहीं… आप कुछ खा लीजिए।”
बोलकर उसने प्लेट धीरे से समीर की तरफ खिसका दी।
समीर को झटका-सा लगा।
“नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है… वो तो मैं… समीरा के बारे में…”
“हाँ सर, समीरा दीदी तो ठीक हो ही जाएँगी। चलिए, अगर ऐसा नहीं है तो बताइए कि हमारा नाम क्या है?” किशोर ने मुस्कुराते हुए पूछा।
समीर अब तक अपनी जागती हुई आँखों वाली नींद से पूरी तरह बाहर आ चुका था। मन ही मन सोचने लगा—
“मुझे इसका नाम तक याद नहीं… ये रोज़ मेरा ख़याल रखता है… कितने दिनों से साथ है… दिन नहीं, महीनों से…”
समीर के चेहरे की परेशानी और ग्लानि पढ़ते हुए किशोर तपाक से बोला—
“अरे सर, कोई बात नहीं। हमारा नाम किशोर है। आपका दुख इतना बड़ा है, जाने दीजिए। ये बताइए, कि समीरा दीदी भी आपकी ही तरह कम बोलती हैं क्या?”
अचानक समीर के चेहरे पर हल्की-सी चमक उभरी। मानो दिन भर काले बादलों से भरे आसमान में सुनहरे सूरज ने पूरी जान लगाकर बादलों के दो भारी टुकड़ों को धकेलकर नीचे झाँका हो और कुछ लम्हों के लिए धरती का एक छोटा-सा हिस्सा रोशन हो गया हो।
समीर ने दबी-सी हँसी के साथ जवाब दिया—
“अरे नहीं… वो तो गज़ब की बातूनी है बचपन से। जब छोटी थी, रोज़ स्कूल से आकर सवाल करना और जवाब न मिलने तक ज़िद पर अड़े रहना उसकी खासियत थी। इतनी समझदार कि मुझे लगता था कि इसे वकील बनना चाहिए बड़ी होकर।”
“अरे वाह! मतलब समीरा दीदी के आगे आपकी एक न चलती थी।” किशोर ने मुस्कुराते हुए कहा।
“हाँ… कुछ ऐसा ही समझ लो। मीरा तो इससे बहस ही नहीं करती थी। सीधा इसे मेरे पास भेज देती थी।”
“मीरा? अरे वाह— समीर, मीरा और समीरा! ये तो बढ़िया नामकरण हो गया।”
“हाँ… मीरा ने ही…”
कहते-कहते समीर थोड़ा गंभीर हुआ।
“हमने कुछ गलत तो नहीं कहा, सर? माफ कीजिएगा।”
“नहीं-नहीं… इसमें तुम्हारी क्या गलती। किस्मत की बात है। मीरा का साथ उतना ही लिखा था। जब समीरा पंद्रह साल की थी, तब मीरा हमें छोड़कर दूसरी दुनिया में चली गई। और हम दोनों की दुनिया ही बदल गई…”
ऐसा लगा रातों रात हमें किसी अंजान देश में लाकर खड़ा कर दिया गया हो। हमें नहीं पता था, कहाँ जाना है, क्या करना है, कैसे जीना है। तब से समीरा ने मानों बोलना ही बंद कर दिया। उसके सारे सवाल ख़त्म हो गए… न दोस्त, न किसी से मिलना-जुलना, हँसती-बोलती भी, तो लगता मेरा मन रखने को। कई साल ऐसे ही गुज़र गए।”
किशोर समीर की बातों को ऐसे सुन रहा था जैसे बच्चे दादा-दादी नाना-नानी से कहानी सुनने में मग्न हो जाते हैं, आस पास कैंटीन में लोग, शोर उन सब से परे।
कॉलेज के बाद समीरा ने एमबीए एचआर करने की बात कही। मतलब मास्टर डिग्री, डिग्री के बाद वाली। तो मैंने उसे समझाया था—
“बेटा, इस काम में तुम्हें नए-नए लोगों से मिलना होगा। तुम्हारी आदत नहीं… क्या कर पाओगी?”
समीरा बोली थी—
“पापा, डोंट वरी। हमें आगे तो बढ़ना ही है। This is a challenge I have given to myself.”
उसने खुद से वादा किया था। ठान लिया था आगे बढ़ने का। उस दिन के बाद से तो मानो समीरा का नया जन्म हुआ। वो बचपन वाली समीरा लौट आई। शांत, शर्मीली समझी जाने वाली समीरा ने एमबीए में टॉप किया।
बताते-बताते समीर की आँखें चमक उठीं। उदासी के बादल अब काफी हद तक छंट गए थे। सूरज तेज़ चमक रहा था। किशोर को महसूस हुआ मानो वह कैंटीन में नहीं, किसी खुली जगह में है। समीर को पहली बार इतना खुश देखकर वह भी चहक उठा।
“अरे सर, ये तो पुनर्जन्म हुआ समीरा दीदी का। चलिए, इसी बात पर आपको बढ़िया कुल्हड़ की चाय पिलाऊँ। ये कैंटीन की चाय भी कोई चाय है?”
बाहर टपरी पर कुल्हड़ में गरमा-गरम चाय की चुस्की लेते हुए किशोर बोला—
“मतलब अभी समीरा दीदी उठेंगी तो फिर सवालों की झड़ी लगाएँगी?”
समीर कुछ सेकंड्स के लिए रुका, फिर बोला—
“पता नहीं… बस वो होश में आए जल्दी।”
“अरे, वो आपको खुश देखेंगी तो फटाफट ठीक हो जाएँगी। कॉलेज में टॉप करने के बाद क्या हुआ?”
“तुम्हें बड़ा मज़ा आ रहा है कहानी सुनने में। वैसे मुझे भी अच्छा लग रहा है। बचपन से समीरा को जाने कितनी कहानियाँ सुनाई हैं।”
“कॉलेज में ही समीरा का एक दोस्त बना। बाद में मुझे पता चला कि समीरा के खुश रहने और फिर से खुलकर जीने की एक बड़ी वजह वो भी था। कॉलेज में ही उसे अच्छा जॉब ऑफर आया और समीरा की नौकरी लग गई। कोई एक-डेढ़ साल नौकरी करने के बाद समीरा ने मुझे उस लड़के से मिलवाया। लड़का मुझे अच्छा लगा। बेटी को खुश देखकर मैंने दोनों को शादी की रज़ामंदी दे दी। मगर लड़के के माँ-बाप राज़ी नहीं थे। उनको लगता था कि बिन माँ की बच्ची को तौर-तरीके नहीं आते होंगे, घर कैसे संभालेगी…”
“ये सब जानकर मेरा बहुत मन हुआ था समीरा को समझाने का, उसे रोकने का… पर मैंने ऐसा नहीं किया। इस बीच मुझे ये भी पता लगा कि लड़का थोड़ा ज़िद्दी है। पर मैंने आख़िरी फैसला समीरा पर ही छोड़ दिया। उसकी ज़िंदगी है, उसे जो ठीक लगे करे।”
सिर हिलाते हुए किशोर बोला—
“हाँ सर, ये तो समझदार और ज़िम्मेदार बाप ही कह सकता है। हमारे गाँव में तो लड़कों तक की नहीं सुनते। कान पकड़कर करवा देते हैं ब्याह। हम ही को ले लीजिए। कुल जमा बीस साल के हैं, आधार कार्ड के हिसाब से। गाँव में बीवी और एक साल की बिटिया भी है। कितना कुछ सीखने को मिल रहा है आपकी बातों से।”
“अरे वाह! मतलब तुम भी एक बेटी के बाप हो। वो भी छोटे से। ख़ैर, अब बन ही गए हो तो अच्छे से निभाओ ज़िम्मेदारी।”
“हाँ सर, वही कोशिश कर रहे हैं। फिर क्या हुआ? माने, लड़के के घरवाले?”
“हाँ… बच्चों के आगे किसकी चलती है आजकल। हम शादी की तैयारी में लगे थे। शादी अगले साल जनवरी की तय हुई थी…”
“कोई बात नहीं सर, आप चिंता मत कीजिए। अभी बहुत समय है। समीरा दीदी को होश आएगा तो झटपट ठीक करके घर भेजेंगे। यहाँ के डॉक्टर लोग बहुत अच्छे हैं।”
“हाय समीरा, हाउ आर यू?”
“हैलो सर, आई एम गुड। हाउ अबाउट यू?”
मैं समीरा का स्पीच थेरपिस्ट हूँ। पिछले पाँच महीनों से उसे जानता हूँ। उसे कोमा से बाहर आए तीन साल हो गए। उसके सिर में आठ से दस चोटें आई थीं। वो चल नहीं पाती। राइट हैंड भी काम नहीं करता। किसी तरह लेफ्ट हैंड से मैनेज कर रही है। कभी पेंट ब्रश से बेरंग पन्नों पर रंगीन दुनिया बनाने वाली लड़की की ज़िंदगी बाहर से देखने वालों को बेरंग लगती है। पर उसके चेहरे पर हमेशा सिर्फ और सिर्फ चमकती मुस्कान।
“तुमने तो कमाल कर दिया, समीरा। तुम्हारी स्पीच तो बहुत अच्छी हो गई है। Stuttering (हकलाना) बिल्कुल खत्म। कुछ ही दिनों में मुझसे भी ज़्यादा क्लियर बोलने लगोगी। फिर तो एचआर मैनेजर दोबारा काम पर…”
“Yes, sir, all thanks to you.”
समीरा थेरेपी सेशन के बाद डिनर टेबल पर समीर के साथ थी। समीर ने आवाज़ लगाई।
“किशोर, छुटकी… सब आ जाओ, एक साथ ही खाते हैं।“
समीरा की शादी की तय तारीख से कुछ दिनों पहले ही उसे होश आ गया था। लेकिन पहले जैसा हो जाने का सफर अभी लंबा था। हर तरह के टेस्ट हुए। डॉक्टर्स ने समीर को बताया कि बेटी की जान तो बच गई है, पर शायद वो नॉर्मल लाइफ न बिता पाए। उसके दोनों पैर और दायाँ हाथ सुन्न थे। बोलने में भी दिक्कत थी। मुश्किल से थोड़ा-बहुत बोल पा रही थी। रिकवर होने में महीने भी लग सकते थे और साल भी। या शायद पूरी ज़िंदगी। या वो शायद कभी चल-फिर ही न पाए।
क्योंकि ऐसे हालात में शादी हो पाना मुश्किल था, समीर ने लड़के वालों को फोन कर पोस्टपोन करने की बात की। और उधर से जो जवाब आया, उसे सुनकर उसे ज़्यादा आश्चर्य नहीं हुआ—
“हम तो पहले भी इस रिश्ते के लिए राज़ी नहीं थे। शायद ये भगवान का इशारा था। अच्छा है आपकी बेटी को होश आ गया। मगर हमारा बेटा पूरी ज़िंदगी तो इंतज़ार नहीं कर सकता। अमेरिका से उसको जॉब ऑफर आया है, तो वो वहीं शिफ्ट हो रहा है।”
समीर ने इसके आगे कोई सवाल नहीं किया और फोन काट दिया।
ज़िंदगी की सबसे अच्छी और सबसे बुरी बात एक ही है — ये किसी के लिए रुकती नहीं। ऐसे में मुश्किल वक्त में इंसान अगर कुछ न भी करे, किसी तरह अपने मन को टूटने से और खुद को मरने से बचा ले, तो वो भी एक बड़ी जीत होती है। धीरे-धीरे एक बड़ी-सी दीवार में छुपा दरवाज़ा नहीं तो कम से कम एक छोटी-सी खिड़की तो निकल ही आती है, जिससे होकर इंसान दूसरी तरफ जा सकता है।
समीर, डॉक्टर्स और हॉस्पिटल स्टाफ की कोशिश से समीरा कुछ ही महीनों में घर शिफ्ट हो गई। और इस बार बाप-बेटी की दो जोड़ियाँ शिफ्ट हुईं। किशोर ने समीर के कहने पर अपने परिवार को बुला लिया था।
समीर ने उससे कहा था—
“बेटी को पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाना है। यहाँ शहर में अच्छी पढ़ाई होगी। और उससे भी ज़रूरी, तुम अपने परिवार के साथ रह पाओगे। ज़िंदगी में परिवार के साथ बिताए समय से ज़्यादा कुछ भी ज़रूरी नहीं।”
कई बार किशोर ने समीर से उस लड़के के बारे में पूछना चाहा, पर समीर ने उसका नाम तक नहीं लिया। वह अतीत को भूलकर सिर्फ आगे देखने की बात करता था। समीरा की सोच भी वैसी ही थी। अब वह ठीक से बोल पा रही थी। हाथ की सर्जरी जल्दी ही होनी थी और उसे भरोसा था कि आवाज़ की तरह हाथ भी जल्दी उसका साथ देने लगेगा। जब तक चलने लायक न हो, तब तक वह घर से ही काम करेगी और फिर ऑफिस जॉइन करेगी। उसने ठान लिया था कि कंपनी में एचआर हेड बनकर उसे बहुत कुछ बदलना है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की मदद कर सके।
“आज खाना तो बड़ा टेस्टी बना है, क्यों समीरा? और किशोर, कल सुबह छुटकी का स्कूल में एडमिशन करवाना है। तुम दोनों को साथ चलना होगा। माँ-बाप दोनों का टेस्ट होता है।”
यह सुनकर किशोर और मीना दोनों की शक्ल देखने वाली थी।
उनकी शक्ल पर बारह बजे देखकर समीर और समीरा दोनों ज़ोर से हँस पड़े।
समीरा के मुँह से निकला—
“पापा, दिस इज़ नॉट फ़नी।”
“हाँ-हाँ, सीरियस बुड्ढी मेंटोर… मेरा मतलब है बड्डी मेंटोर। वैसे अब तो घर में दो-दो मेंटोर हैं — एक तुम और एक ये छुटकी।”
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