आप तो जानते ही हो!

आप तो जानते ही हो, झूठी खबरें सच्चे सपने! A short story about wierd dream thats actually true. Indian Society. Indian Politics. Hindi Story by Gaurav Sinha
Blurred potrait photo of a woman smiling
झूठी खबरें सच्चे सपने, आप तो जानते ही हो ! (Photo by Efrem Efre )

“यार सर घूम गया मेरा… क्या था ये ? क्या सच में मैं ऐसा सोचती हूँ ? छी… कितनी गंदी सोच है मेरी?”

सुबह के चार बजे थे, आम तौर पर 9 बजे से पहले न उठने वाला इंसान जब अँधेरे में उठ कर बिस्तर पर बैठा हो। तो, ज़ाहिर सी बात है कि उसका दिमाग वैसे ही उलझा होगा, जैसे पहली बार चाइनीज़ खाते हुए आप नूडल्स को सुलझाने में उलझ जाते हैं। आँखें मलते हुए, अधखुली आँखों से बगल में पति को आराम से खर्राटे मारते हुए देखा। तो सुकून हुआ कि चलो सब एक बुरा सपना ही था।

किसी तरह दोबारा सोने की जद्दोजहद शुरू हुई। मगर एक बार नींद टूटे और वो भी एक भयानक सपने के बाद तो दिमाग को फ़िर से शांत होने में उतना ही टाइम लगता है। जितना शायद पहले ब्रेक अप के बाद, टूटा हुआ दिल फिर से जुडने में। और जैसे अक्सर कई लोगों के साथ होता भी है, दिल दोबारा ताउम्र नहीं जुड़ पाता किसी से। ठीक वैसे ही कभी कभी नींद भी दोबारा नसीब नहीं होती। कुछ देर तक करवट बदलने के बाद उसने डिसाइड किया कि कोशिश फिजूल है। इससे अच्छा है अपने सपने को ही समझे। अपने उलझे हुए मन को सुलझाये। इससे पहले तो उसने अपना ये रूप सोचा तक नहीं था, सपने में भी नहीं। खैर, शुक्र है सपने में ही देखा ये रूप।

ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हुए, वो अपने पड़ोस के तकरीबन आठ-दस साल के बच्चे को पीट रही थी। मोहल्ले के सारे लोग इकट्ठा हो गए थे। पर कोई भी बच्चे को बचाने के लिए आगे नहीं आया। जो कि अजीब था। आमतौर पर कोई न कोई तो इंसान होने का धर्म निभा ही लेता है। पर आज, सब उसी का साथ दे रहे थे, जो एक मासूम बच्चे को बेरहमी से पीट रहा था। जब थप्पड़ों की गिनती इतनी हो गई कि ठीक से गिनी न जा सके। उसके बाद वो हुंकारती हुई पलटी और पास पड़ा एक डंडा उठा लिया। बच्चा रो रहा था, बिलख रहा था। चेहरा आंसुओं से सना हुआ, गाल जो कुछ देर पहले गुलाबी थे। कुछ पल के लिए लाल हुए, अब गहरे काले नज़र आ रहे थे।

बच्चा गीडगिड़ाने लगा – “नहीं आंटी मुझे मत मारो, अब यहाँ क्रिकेट नहीं खेलूँगा। ऊ… उण्ण… ऊँह॥ ऊ उन्न आं आंआआ…  आंटी मुझे बहुत दर्द हो रहा… प्लीज्ज मुझे मत मारो…”

पता नहीं आज इस पढ़ी लिखी सभ्य सी दिखने वाली औरत को क्या हुआ था। कौन सा भूत सवार था। डंडा हवा में लहराया और बच्चे के पीठ पर जाकर इतनी ज़ोर से लगा कि बच्चा लडखड़ाकर ज़मीन पर गिरा गया। उसका रोना कुछ कम हुआ। शायद दर्द इतना ज़्यादा था कि उसे समझ नहीं आ रहा था कि रोये, कराहे… क्या करे जिससे वो किसी तरह बच जाये आज। क्रिकेट के एक शॉट के बदले ऐसी मार तो फिल्मों में भी नहीं पड़ते देखी होगी किसी ने। उसने अपनी दोनों आँखें बंद कर ली और मन ही मन भगवान को याद करने लगा कि अब उसकी और पिटाई न हो। मगर उसे नहीं पता था कि हैवान इन दिनों भगवान पर हावी हैं। और ये हैवान आज इस औरत में पक्का उतर आया था।

बच्चे की सभी प्राथनाएँ और मिन्नतें आज बेकार थी। वो औरत एक बार फिर से बच्चे की तरफ बढ़ी। भीड़ भी बढ़ गई थी। सब पागलों की तरह शोर कर रहे थे। मारो… मारो… मारो, जैसे कोई क्रिकेट का मैच चल रहा हो। और स्टैंड में दर्शक चोक्कों छक्कों के लिए चिल्ला रहे हों। सब पर एक उन्माद छाया हुआ था। वो स्लो मोशन  में डंडा हाथ में लिए, एक उन्माद, नशे या किसी अजीब बेहोशी में बच्चे तक पहुँची। डंडा फिर से लहराया और इस बार सहमे…. सिसकते हुए… ज़मीन पर मुँह दोनों हाथों से छुपाए… डर से काँपते हुए… बच्चे के सर पर लगा। कुछ फूटने की आवाज़ आई, मानो किसी ने मंदिर की चोखट पर नारियल फोड़ा हो। बच्चे के सिर से खून बहता हुआ ज़मीन पर बहने लगा। ठीक वैसे ही जैसे नारियल फूटने के बाद पानी छिटक जाता है।

भीड़ के बुदबुदाने की आवाज़ उसके कानों में पड़ी – “अच्छा ही किया। सामने वाली झोपड़ पट्टी से आकर हमारे बच्चों को बिगाड़ रहा है। सब गाली गलोज़ करना सीख जाएँगे। पता नहीं किस धर्म का है। धर्म कोई भी हो, किसी काम वाली का ही बच्चा होगा, बराबरी का तो नहीं लगता। हमारे मोहल्ले में खेलने लायक थोड़ी है। अरे कहीं मर तो नहीं गया, पुलिस केस हो जाएगा… चलो निकलो यहाँ से… यही औरत झेले…हमने थोड़ी मारा है, कोई मारता है.. बच्चे को ऐसे।“

“अरे उठो, क्या हो गया तुम्हें ठीक हो।“ – पति ने पसीने पसीने होती, नींद में बदबड़ाती पत्नी को उठाया।

उसने आँखें खोली। गहरी साँस ली। और कुछ मिनटों तक लेटी सोचती रही। फिर बोली, बहुत बुरा सपना देखा था। इससे पहले कुछ समझ पाती या पति को समझा पाती। दरवाजे पर घंटी बजी। वो उठकर गई, दरवाजा खोला तो देखा काम वाली दीदी आई है सफाई करने। साथ में वही आठ दस साल का लड़का, गंदे फटे हुए कपड़े पहने। दाँत दिखाते हुए, मुसकुराते हुए बोला – “नमस्ते आंटी। भैया की छुट्टी होगी न आज। उनके साथ क्रिकेट खेल लूँ?”

वो सपना एक सेकंड में फिर से फ़्लैशबैक की तरह दिमाग से तेज़ी रफ्तार से गुज़रा। वो भी मुसकुराते हुए बोली – हाँ, जाकर देख भैया जागा भी है या नहीं। नहीं जागा तो ये ले पानी डाल दे उसके मुँह पर।“

“अरे नहीं, भैया बहुत अच्छे हैं, मैं धीरे से जगाता हूँ उनको।“

बच्चे के जाने के बाद वो काम वाली दीदी को बोली – “इसके कपड़े कितने गंदे हैं, साफ क्यूँ नहीं करती। और फट भी गएँ हैं।“

“अरे दीदी ये सुबह उठते ही ग्राउंड में खेलने भाग जाता है, रोज़ कपड़े फाड़ लाता है। कितने कपड़े दिलाएँ। आप तो जानती ही हैं, इसका बाप….”

हाँ हाँ, सब पता है। इसको आज यहीं छोड़ जाओ। अपने फेवरेट भैया के साथ खेलने दो। हमे भी फुर्सत मिलेगी। शाम को बाज़ार जा रहे हैं दीवाली की शॉपिंग करने। इसको भी कुछ नए कपड़े दिलवा देंगे। आपको भी कुछ चाहिए तो बता दो। क्रिसमस और दीवाली का एक साथ ही ले लो। महँगाई कितनी है आजकल, आप तो जानती ही हो……”

तभी उसके कानो में टीवी न्यूज़ का चुभने वाला शोर सुनाई दिया – “भीड़ ने एक बेकसूर युवक को चोर समझकर, पीट पीट कर मार डाला… माँ का रो रो कर हुआ बुरा हाल…”

उसने पति को चिल्लाते हुए कहा, – “बंद करो टीवी, आज से न्यूज़ चैनल नहीं चलेंगे इस घर में। आपको देखना है तो फोन में इयरफोन लगा कर देखो दिन भर।“

पति को कुछ समझ में नहीं आया। चुपचाप टीवी बंद किया और अख़बार उठा कर पढ़ने लगा।

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