
सीलिंग फैन की कराहने की आवाज़ तेज़ होती जा रही थी। खिड़की इतनी खुली थी, जिससे हवा की एक पतली सी धार अंदर हल्के हल्के आ रही थी। आ तो रही थी, मगर जा कहाँ रही थी? उसका कोई अता-पता नहीं था। मतलब उसका असर न के बराबर था। ये कुछ-कुछ वैसा ही था। जैसे, सर्दियों में तलवार की धार सी धूप, खिड़की से होते हुए दीवार को चीरने की नाकाम कोशिश करती है।
उसे बैचनी से करवट लेते हुए जाने कितने घंटे… कितने दिन? या शायद कितने महीने हो गए थे। न हवा को कुछ पता था, न धूप को और न उसके मन को। सब सिर्फ “थे”। क्यूँ, कैसे, कहाँ… कौन जाने। अचानक लगा साँस रुक गई है। उठ कर बैठा, शरीर पसीने से तरबतर। पर बुखार नहीं था। क्या था, कौन जाने। कुछ मिनट ऐसे ही अँधेरे की आँखों में देखने की कोशिश की।
एक पन्ने पर पेन चलाना शुरू किया। क्या लिख रहा था, अँधेरा उसे पढ़ नहीं पा रहा था। पर लिखा हुआ कुछ अँधेरे जैसा ही था। गहरा काला। लिखने के बाद आदत से मजबूर होकर उसने पढ़ना शुरू किया।
“बहुत कोशिश की, उस एक स्क्रिप्ट के बाद आज तक कुछ और नहीं लिख पाया। दो साल हो गए। जितने पैसे कमाए थे। जितने दोस्त पाए थे… या फ़िर यूँ कहूँ , पैसों और शोहरत के साथ मुफ्त आए लोग। सब धीरे धीरे करके उड़ा दिये या ख़ुद ब ख़ुद पुरानी दीवार पर लगे पेंट की तरह उड़ गए। और साथ ही उड़ा दिया अपने लिखने का हुनर। अब तो कोशिश करने का भी मन नहीं होता। हालत ये है कि ये आख़िरी चिट्ठी, जिसे शायद ही कोई पढ़ेगा। इसे लिखने में भी मन उचट रहा है। कोई नहीं है जिसे अलविदा कहूँ। बस बहुत हुआ… सब ख़त्म…”
“ये चिट्ठी भी कितनी बकवास लिखी है।“ मन ही मन बुदबुदाता हुआ मिस्टर लेखक 1.0 धीरे से कुर्सी से उठा, बालकनी का दरवाज़ा खोलकर उसकी ग्रिल तक गया। एक बार फ़िर अँधेरे की आँखों में देखा, एक तेज़ ढप्पपपप… धम्मममम…। सुबह की रोशनी में शोर ही शोर, पुलिस, एम्ब्युलेन्स, लोगों की फुसफुसाहट… क्या हम्म हम्म क्यूँ हम्ममम।
खिड़की से अंदर आती हल्की सी ठंडी हवा की धार उसके चेहरे से डरते-डरते धीरे से टकराई। कि कहीं उसकी नींद न टूट जाए। उसको नींद बहुत मुश्किल से आती थी। पर अब तो हवा से गलती हो गई थी। वो उठकर बैठ गया। पसीने से तर बतर, रोज़ की तरह बुरा सपना देखा होगा। पागल को सपने भी असल ज़िंदगी जैसे ही आते थे। स्क्रिप्ट उसके मुँह पर फेंकी गई होगी। या उसने ख़ुद अपना लिखा, फाड़कर डस्ट्बिन में फेंका होगा। या जलाकर कमोड में फ्लश कर दिया होगा। या शायद इस बार बालकनी से ख़ुद को धकेल दिया हो, किसी हारे हुए किरदार की तरह।
उठकर अपने डेस्क पर गया। पन्ने पर पेन चलाना शुरू किया।
“लिखने की कोशिश करनी पड़े तो क्या हम वाक़ई में ख़ुद को लेखक कह सकते हैं? क्यूँ नहीं? हम इंसान हैं, पर हमेशा इंसानियत का चोला नहीं पहनते , या पहन नहीं पाते । लेकिन बेहतर इंसान होने की कोशिश तो कर ही सकते हैं? ठीक वैसे ही जैसे हम पूरी ज़िंदगी साँस तो लेते हैं पर ज़िंदा नहीं होते। पर कोशिश यही रहती है कि ज़्यादा से ज़्यादा लम्हों में ज़िंदगी को महसूस कर सकें। लेखक होने का ये मतलब नहीं है कि आप मशीन की तरह हर समय लिख पाएँ। तो, न लिख पाना और लिखने की कोशिश करते रहना ही शायद हमें सही मायने में लेखक बनाता है।“
खिड़की से अब हवा की पतली धार और उससे भी महीन रोशनी का धागा एक साथ मिलकर उसके चेहरे को सहला रहे थे। उसने उठकर रेडियो ऑन किया। बालकनी का दरवाज़ा खोला। उबासी और अंगड़ाई एक साथ उस पर कूद पड़े। और मिस्टर लेखक 2.0 मुसकुराते हुए बाहर का शोर सुनने लगा – स्कूल वैन का हॉर्न, बिल्डिंग में घर खोजती चिड़ियों के झुंड की चटर पटर…
डींग डोंग, डींग डोंगगगग… डोरबेल बजी।
“बस अब और नहीं, आज ही रेंट दो। फेमस राइटर हो सोचकर घर दिया था। एक साल से रेंट नहीं दिया, अब कोई बहाना नहीं।“
“अरे अंकल आओ तो सही, कमाल की कहानी है, आपको मज़ा आ जाएगा। साथ में गरमा गरम चाय।“
“नहीं, आज मैं झाँसे में नहीं आऊँगा। तेरी आंटी मुझे लटका देगी इसी बालकनी से।“
“अरे वाह, कमाल है, आप तो अंतर्यामी हो। आपको कैसे पता कि बालकनी की ही कहानी है? तो एक बिल्डिंग के फ़िफ्थ फ्लोर की बालकनी से…..
(रेडियो से गाने की आवाज़ आई – मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक किस्सा सुनो)
If you like audio stories, please check this story playlist at The Creative Zindagi Podcast
Have you read these? –
- मालदा आम | King of Mangoes
- नीली साइकिल… और सड़ते हुए फ़ल!
- जिजीविषा
- उसकी मुस्कान बाकी है
- मेरा मन, तेरा मन (Between Words & Silence)
- सन्नाटे का शोर…
- एंटेना, कद्दू और एजुकेशन सिस्टम
- दो ज़िंदगियाँ, एक आईना
- यूटोपिया (EUTOPIA)
- बात तो सही है!
- खिड़की, रद्दी और खबरें!
- मर्द का मज़हब, औरत की जात…!
- ओह माय गॉड, सुरभि!
- a trialogue!
- आप तो जानते ही हो!
- प्रैंकड़: Stranger at the Stop
- अजनबी हमसफ़र!
- रिहाई.. खुद से!
- “शोर” बुराई का..
- प्रकृति का स्वभाव और इंसान की प्रकृति !
- सेल्फी पॉइंट से परे शहरों की असली खूबसूरती
- शेयरिंग इस केयरिंग !
- नया साल, पीरियड्स पेन और फ़र्ज़ी ग्लोबल वार्मिंग!
- टेलीपैथी
- छोटे-छोटे ईमानदार सच, एक बड़े झूठ पर भारी।
- सर्द मौसम की एक खुशनुमा कुदरती मुलाक़ात।
- सनडे, नींद, डोरबैल और प्रीविलेजेड लाइफ।
- रेसोल्यूशन न लेने का रेसोल्यूशन!
- लाइफ टाइम गैरंटी।
- शादी, शिक्षा और बाज़ार : सामाजिक विडंबनाओं का संसार।
- ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय!
Feedbacks – Reader’s POV